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उत्तर प्रदेश की मृदा, कृषि और पशुपालन | Soil, Agriculture and Animal Husbandry in Uttar Pradesh

उत्तर प्रदेश की मृदा, कृषि और पशुपालन | Soil, Agriculture and Animal Husbandry in Uttar Pradesh

नमस्कार दोस्तों, Exams Tips Hindi शिक्षात्मक वेबसाइट में आपका स्वागत है। इस आर्टिकल में उत्तर प्रदेश की मृदा, कृषि एवं पशुपालन से संबंधित जानकारी (Soil, Agriculture and Animal Husbandry in Uttar Pradesh GK) दी गई है। जैसा कि हम जानते है, उत्तर प्रदेश, भारत का जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश की प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत ज़्यादा कम्पटीशन रहता है। यह लेख उन आकांक्षीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो उत्तर प्रदेश सिविल सर्विस (UPPSC), UPSSSC, विद्युत विभाग, पुलिस, टीचर, सिंचाई विभाग, लेखपाल, BDO इत्यादि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है। तो आइए जानते है उत्तर प्रदेश से संबंधित जानकारी-


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उत्तर प्रदेश की मृदा, कृषि और पशुपालन | Soil, Agriculture and Animal Husbandry in Uttar Pradesh

➤ मृदा चट्टानों की टूट-फूट तथा कार्बनिक पदार्थों के विगलन से निर्मित होती है। यह पृथ्वी की ऊपरी उपजाऊ सतह है।

➤ मृदा में जल, वायु, खनिज पदार्थ, जैव पदार्थ तथा अनेक सूक्ष्म जीव पाये जाते हैं। इन अवयवों के कारण मृदा के अनेक प्रकार होते हैं।

➤ उत्तर प्रदेश की मृदा को तीन विभागों में विभाजित किया गया है-


भाँभर एवं तराई क्षेत्र की मृदाएं

➤ प्रदेश का उत्तरी अर्थात् भांभर क्षेत्र हिमालयी नदियों के भारी निक्षेपों से निर्मित होने के कारण यहां की मिट्टी कंकड़ों-पत्थरों तथा मोटे बालुओं से निर्मित है जो कि काफी छिछली होती है। अतः जल नीचे चला जाता है। इस

क्षेत्र में कृषि कार्य असंभव है।

➤ यहां ज्यादातर झाड़ियों एवं वन पाये जाते हैं।

➤ महीन कणों के निक्षेप से निर्मित तराई क्षेत्र की मृदा समतल, दलदली, नम और उपजाऊ होती है।


पठारी क्षेत्र की मृदाएं

➤ प्रदेश के दक्षिणी पहाड़ी पठारी क्षेत्र के टूटने और अनेक भीतिक, रायायनिक एवं जैविक क्रियाओं के परिणामस्वरूप इस क्षेत्र की मृदाओं का निर्माण हुआ है।

➤ इस क्षेत्र में ललितपुर, झांसी, जालौन, हमीरपुर, दक्षिणी प्रयागराज, मिर्जापुर, सोनभद्र महोबा, बांदा, चित्रकूट, और चंदौली जिले के कुछ क्षेत्र सम्मिलित हैं।

➤ सामान्य तौर पर इस क्षेत्र की मृदा को बुंदेलखंडीय मृदा कहा जाता है लेकिन थोड़े-बहुत अंतरों के साथ यहां कई मृदाएं पायी जाती हैं। यथा - लाल मृदा, परवा (पड़वा), मार (माड), राकर (राकड़) एवं भोण्टा आदि । संक्षेप में इन मृदाओं का विवरण इस प्रकार है-

1. लाल मृदा

यह मृदा दक्षिणी प्रयागराज झांसी, मिर्जापुर, सोनभद्र तथा चन्दौसी जिलों में पायी जाती है।

इस मृदा का निर्माण बालूमय लाल विंध्य चट्टानों के टूटने-फूटने से हुआ है।

2. परवा मृदा

इस मृदा को पड़वा या पडूवा भी कहा जाता है जो कि हमीरपर, जालौन तथा यमुना के तटीय क्षेत्रों विशेषकर बीहड़ों में पायी जाती है।

यह हल्के लाल-भूरे रंग की बलुई दोमट मृदा है, जिसमें जैव तत्वों की कमी होती है।

3. मार (माड़) मृदा

यह मृत्तिका मृदा है, जिसका रंग काली मृदा के समान चिकना व काला होता है। यह मृदा प्रदेश के पश्चिमी जिलों में पायी जाती है।

4. राकर (राकड़)

यह लाल-भूरे रंग की दानेदार मृदा है जो कि सामान्यतः ढालों पर पायी जाती है। मोटी राकर और पतली राकर के रूप में इसके दो वर्ग हैं।


मध्य के मैदानी क्षेत्र की मृदाएं

➤ इस मैदान में पायी जाने वाली मृदा को जलोढ़ या कछारी या भात मृदा कहा जाता है जो कि कांप मिटूटी, कीचड़ एवं बालू से निर्मित है।

➤ यह मृदा बहुत गहरी है और पूर्ण विकसित दशा में है। इस मैदान की लगभग संपूर्ण मृदा को दो वर्गों में विभाजित किया गया है-

1. खादर मृदा

जो मृदा नदियों द्वारा प्रत्येक बाढ़ के साथ परिवर्तित होती रहती है उसे खादर या कछारी या नवीन जलोढ़ मृदा कहा जाता है।

यह मृदा हल्के भूरे रंग की, छिद्र युक्त महीन कणों वाली तथा बांगर की अपेक्षा अधिक जल धारण करने की क्षमता वाली होती है।

इस मृदा में चूना, पोटाश, मैग्नीशियम तथा जैव-तत्वों की मात्रा अधिक होती है।

इसे बलुआ, दोमट, मटियार आदि नामों से भी जाना जाता है। इनकी उर्वरा शक्ति अधिक होती है और खाद देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

2. बांगर मृदा

गंगा-यमुना मैदानी क्षेत्र का वह भाग जहां नदियों के बाढ़ का जल नहीं पहुंच जाता है, वहां की मृदा की बांगर या पुरानी जलोढ़ मृदा कहा जाता है।

इसे दोमट, मटियार बलुई-दोमट, मटियार दोमट आदि नामों से भी जाना जाता है।

इस मृदा क्षेत्र की मिट्टियां परिपक्व तथा अधिक गहरी होती है। सघन कृषि और अव्यवस्थित प्रबंध के कारण इन मृदाओं में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की कमी होती जा रही है। अतः इन घटकों वाले खाद की अधिक अवश्यकता पड़ती है।

3. लवणीय तथा क्षारीय मृदाएं

प्रदेश के बांगर मृदा वाले क्षेत्र में भूमि के समतल होने और जल निकासी का उचित प्रबंध न होने, सिंचाई की अधिकता, नहरों से सिंचाई किये जाने लवणयुक्त जल से सिंचाई, तथा क्षारीय उर्वरकों के लगातार प्रयोग आदि कारणों से लगभग 10 प्रतिशत भूमि ऊसर हो चुकी है जो कि प्रदेश के अलीगढ़, मैनपुरी, कानपुर, उन्नाव, एटा, इटावा, रायबरेली, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जौनपुर, प्रयागराज आदि जिलों में पायी जाती है। इसे रेह, बंजर तथा कल्लर नामों से भी जाना जाता है।

4. मरूस्थलीय मृदा

प्रदेश के कुछ पश्चिमी जिलों (मथुरा, आगरा, अलीगढ़) में पायी जाती है।

शुष्कता व भीषण ताप के कारण चट्टानें खंडित होकर बालू के कणों में परिणत हो जाती हैं।

इसमें लवण व फास्फोरस अधिक मात्रा में पाये जाते हैं, परंतु जीवांश पदार्थ व नाइट्रोजन का अभाव होता है। इस मिट्टी में सिंचाई द्वारा कुछ मोटे अनाजों की खेती की जाती है।

5. भूड़ मृदा

गंगा-यमुना व उनकी सहायक नदियों के बाढ़ वाले क्षेत्रों में बहुत पहले से निर्मित बलुई मिट्टी के 10 से 20 फीट उंचे टीलों को भूढ़ कहा जाता है। यह मृदा हल्की दोमट-बलुई होती है।

6. काली मृदा (रेगुर)

प्रदेश के पश्चिमी जिलों तथा बुंदेलखंड क्षेत्र में कहीं-कहीं काली मृदा भी पायी जाती है। इसे स्थानीय भाषा में करेल या कपास मृदा कहा जाता है।


उत्तर प्रदेश की मृदा से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

➤ प्लीस्टोसीन युग से आज तक नदियों के निक्षेपों से बना है गंगा-यमुना मैदान

➤ गंगा-यमुना के मैदान में मुख्यतः पायी जाती है जलोढ़ मृदा

➤ नवीन व प्राचीन जलोढ़ मृदा को जाना जाता है क्रमशः खादर व बांगर नाम से

➤ स्थानीय भाषा में नई जलोढ़, बलुआ, मटियार या मटियार दोमट कहा जाता है खादर मृदा को 

➤ स्थानीय भाषा में पुरानी जलोढ़, उपहार, दोमट आदि कहा जाता है बांगर मृदा को

➤ जलोढ़ मृदा का निर्माण हुआ है कॉप, कीचड़ व बालू से

➤ जलोढ़ मृदा में पोटाश एवं चूना की अधिकता होती, लेकिन कमी होती है फास्फोरस

➤ नाइट्रोजन व जैव तत्व की गंगा-यमुना मैदान में कहीं-कहीं लवणीय या क्षारीय मृदाएं मिलती हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में कहा जाता हैऊसर या बंजर या कल्लर या रेह

➤ मैदानी क्षेत्र में कुछ मात्रा में मरुस्थलीय मृदा पायी जाती हैमथुरा, आगरा आदि जिलों

➤ पश्चिमी उत्तर प्रदेश व बुंदेलखण्ड में कहीं-कहीं मिलती हैकाली मृदा

➤ रंगुर, करेल व कपास मृदा के नाम से जाना जाता है काली मृदा को

➤ लाल मृदा, परवा या पड़वा, मार या माड़, राकर या राकड़ व भोण्टा मृदा पायी जाती हैबुन्देलखण्ड क्षेत्र में

➤ राज्य में सबसे अधिक शुष्क खेती क्षेत्र हैबुदेलखण्ड

➤ प्रदेश में सबसे अधिक मृदा अपरदन होता है जल से

➤ प्रदेश में अवनालिका अपरदन (जल) से सर्वाधिक प्रभावित जिला इटावा है फिर क्रमशः हैं आगरा व जालौन।

➤ राज्य में वायु अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित जिले हैं मथुरा, आगरा व इटावा

➤ फसल चक्र अपनाने से कम से कम हानि होती है उर्वराशक्ति की

➤ राज्य में वायु अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित जिले हैं मथुरा, आगरा व इटावा

➤ फसल चक्र अपनाने से कम से कम हानि होती है उर्वराशक्ति की


उत्तर प्रदेश की प्रमुख फसलें

प्रदेश में ऋतुओं के अनुक्रम में तीन प्रकार की फसलें (रबी, खरीफ एवं जायद) बोयी जाती है।

1. रबी की फसलें

➤ रबी की फसलों की बोआई शीत ऋतु के शुरूआत अर्थात् अक्तूबर से दिसंबर के मध्य तक की जाती है।

➤ इन फसलों को कम जल और औसत ताप की आवश्यकता होती है।

➤ रबी की फसलों के अंतर्गत गेहूं, जौ, चना, मटर, मसूर, सरसों, अलसी, लाही, आलू, तम्बाकू आदि फसलें आती हैं।

2. खरीफ की फसलें

➤ ये फसलें अधिक जल और ताप चाहने वाली होती है।

➤ इनकी बोआई मई से जुलाई तक की जाती है और कटाई सितंबर से अक्तूबर तक कर ली जाती है। इसके अंतर्गत चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, सांवा, कोदों, टांगून, सनई (जूट), अरहर (4 माह वाली), मूंगफली, कपास, गन्ना, रामदाना, तिल्ली आदि फसलें आती हैं।

3. जायद की फसलें

➤ इन फसलों को बहुत अधिक ताप की आश्यकता होती है।

➤ इनकी बोआई मार्च-अप्रैल में की जाती है और जून-जुलाई तक काट लिया जाता है

➤ जायद फसलों के अंतर्गत ककड़ी, खीरा, खरबूज, तरबूज, परवल, लौकी, काशीफल, मूंग, चीना, लोबिया, आदि आते हैं। वे अल्प अवधि में तैयार होती हैं।


उत्तर प्रदेश में फसल उत्पादन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी


➤ दशहरी आम का विशेष क्षेत्र मलीहाबाद (लखनऊ) है, जबकि लंगड़ा आम का हैवाराणसी

➤ उत्पादित आम को दूसरे प्रदेशों में बेचा जाता हैनवाब ब्राण्ड नाम से

➤ अमरुद के लिए प्रयोग एवं प्रशिक्षण केन्द्र इलाहाबाद में है, जबकि आम का ऐसा केन्द्र लखनऊ में

➤ रुहेलखण्ड, गंगा-यमुना दोआब में की जाती है थोड़ी मात्रा में कपास की खेती

➤ अफीम की खेती की जाती है बाराबंकी व गाज़ीपुर

➤ सर्वाधिक आलू उत्पादकता वाले जिले हैं हाथरस व कन्नौज

➤ अरहर, चना व अदरक की सर्वाधिक खेती होती है बुन्देलखण्ड क्षेत्र में

➤ प्रदेश की सर्वाधिक महत्वपूर्ण नकदी फसल है गन्ना

➤ गन्ना उत्पादन के विशेष क्षेत्र हैं तराई व मेरठ के निकटवर्ती क्षेत्र

➤ प्रदेश में सस्य गहनता 156.91%

➤ प्रदेश में सर्वाधिक क्षेत्र पर बोई जाने वाली फसल है गेहूँ

➤ मूंग, चीना व लोविया हैं जायद फसल

➤ प्रदेश में गेहूँ की सर्वाधिक उत्पादकता है गंगा-याघरा दोआब क्षेत्र की

➤ राज्य में कुल सहकारी गन्ना विकास समितियां हैं169

➤ प्रदेश में सर्वाधिक कृषि श्रम उत्पादकता वाला क्षेत्र हैपश्चिमी उत्तर प्रदेश

➤ मूंगफली उत्पादन का विशेष क्षेत्र है रुहेलखण्ड क्षेत्र

➤ चावल उत्पादन के विशेष क्षेत्र हैं तराई व पूर्वी उत्तर प्रदेश

➤ प्रदेश में सहारनपुर व लखनऊ आम के निर्यातक जोन हैं, जबकि आगरा हैआलू का निर्यातक जोन

➤ प्रदेश का सर्वाधिक आंवला उत्पादक जिला हैप्रतापगढ़


उत्तर प्रदेश की प्रमुख फसलों का विवरण


चावल

➤ प्रदेश के कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 18  प्रतिशत भाग पर चावल की खेती की जाती है।

➤ प्रदेश के तराई क्षेत्रों में मुख्यतः मेहाराजगंज, सिद्धार्थनगर, कशीनगर, देवरिया, गोरखपुर, बस्ती, गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, लखीमपुर, पीलीभीत, सहारनपुर, मऊ, बलिया, वाराणसी, लखनऊ आदि जिलों में चावल की खेती की जाती है।


गेहूं

➤ प्रदेश में कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 24 प्रतिशत भाग पर गेहूं की खेती की जाती है।

➤ प्रदेश में गेहूं की खेती के पर्वतीय व पठारी भागों को छोड़कर सर्वत्र की जाती है।

➤ गोरखपुर प्रदेश का सर्वाधिक गेहूं उत्पादक जिला है। सर्वाधिक उत्पादकता गंगा-घाघरा दोआब क्षेत्र की है।


गन्ना

➤ प्रदेश के कुल कृषि योग्य क्षेत्र के लगभग 13 प्रतिशत भाग पर गन्ने की खेती की जाती है।

➤ यह राज्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण नकदी फसल है।

➤ राज्य में गन्ना उत्पादन के दो प्रमुख क्षेत्र हैं तराई क्षेत्र एवं गंगा-यमुना का दौआब क्षेत्र है।


कपास

➤ प्रदेश के गंगा-यमुना दोआब, रूहेलखंड और बुंदेलखंड क्षेत्रों में सिंचाई के सहारे कपास की खेती की जाती है।

➤ यहां छोटे रेशे की अधिक व लंबे रेशे की कम कपास उगाई जाती है।

➤ इसे जून-जुलाई में बोकर पौधों से अक्टूबर-नवंबर तक कपास की चुनाई कर ली जाती है।

➤ आगरा, मथपुरा, अलीगढ़ व हाथरस में सघन कपास विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है।


मूंगफली

➤ मूंगफली मूलतः एक खरीफ फसल है जिसकी बोआई जून-जुलाई में की जाती है और खुदाई नवंबर-दिसंबर में।

➤ इसके लिए बलुई मिट्टी उपर्युक्त है। प्रदेश के सीतापुर, हरदोई, एटा, बदायं, मैनपुरी, मुरादाबाद आदि जिलों में थोड़ी मात्रा में मूंगफली की खेती की जाती है।


अफीम

➤ प्रदेश में अफीम का सबसे बड़ा उत्पादक जिला बाराबंकी है।

➤ बाराबंकी के अतिरिक्त गाजीपुर में भी अफीम की खेती की जाती है। गाजीपुर में राज्य की एकमात्र अफीम फैक्ट्री है।


उत्तर प्रदेश में उद्यान कृषि


➤ राज्य में चयनित 45 जिलों में फल, शकभाजी, पुष्प मसाला व औषधीय फसलों के क्षेत्र का उत्पादन में विस्तार हेतु कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

➤ आम, अमरूद व आंवला के उत्पादन व क्षेत्र में वृद्धि हेतु सहारनपुर, मेरठ, बागपत, प्रतापगढ़, वाराणसी, फैजाबाद, कौशाम्बी, लखनऊ, प्रयागराज, आदि 15 जिलों में कुल 20 (17 आम, 2 अमरूद तथा 1 आंवला हेतु) फलपट्टी

विकास योजना चलाई जा रही है

➤ प्रदेश में कृषि औद्यानिक उत्पादों के संस्करण को बढ़ावा देने के लिए एक राज्य स्तरीय (राजकीय फल संरक्षण एवं डिब्बा बंदी संस्थान, लखनऊ) व 10 मंडल स्तरीय शिक्षण संस्थान हैं। जहां डिप्लोमा डिग्री दी जाती है।

उत्तर प्रदेश की प्रमुख उद्यान फसलें इस प्रकार हैं-


आम

➤ प्रदेश के मध्यवर्ती और पश्चिमी जिलों में मुख्यतः लखनऊ, सीतापुर, उन्नाव, मुरादाबाद, सहारनपुर, हरदोई, बाराबंकी, फैजाबाद, बरेली, मेरठ, गाजियाबाद, कानपुर, बुलंदशहर, वाराणसी आदि जिलों में आम की खेती की जाती है।

➤ लखनऊ को मलीहाबादी, दशहरी, सहारनपुर का सफेदा व चौसा, मेरठ व बागपत का स्टौल तथा वाराणसी का लगड़ा आम प्रसिद्ध है। दशहरी आम का निर्यात भी किया जाता है।

➤ प्रदेश में उत्पादित आम को देश के विभिन्न शहरों में नवाब ब्रांड नाम से प्रचालित किया जाता है।


केला

➤ प्रदेश में वाराणसी, कौशाम्बी, प्रयागराज और गोरखपुर में बड़े पैमाने पर केला पैदा किया जाता है।

➤ यहां माल-भोग, चीनी-चंपा, अधेश्वर, दूधसागर किस्म का केला उत्पादित किया जाता है।


संतरा

➤ संतरा की खेती बुंदेलखंड के कुछ जिलों तथा सहारनपुर के आसपास के क्षेत्रों में की जाती है।

➤ माल्टा - प्रदेश में मेरठ, वाराणसी और सहारनपुर

➤ जिलों में माल्टा उत्पादित होता है।


लीची

➤ प्रदेश के सतारनपुर और मेरठ जिलों में लीची पैदा होती है।


अमरूद

➤ प्रदेश में मुख्यतः प्रयागराज, कौशाम्बी, बदायं, कानपुर, बरेली और अयोध्या जिलों में अमरूद पैदा होता हैं।


नींबू

➤ नींबू विशष रूप से प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में और सामान्य रूप से सभी क्षेत्रों में नींबू पैदा होता है।


उत्तर प्रदेश की अन्य प्रमुख फसलें


आलू

➤ उत्तर प्रदेश आलू के उत्पादन में अग्रणी है। इसके मुख्य उत्पादन क्षेत्रों में फर्रुखाबाद, कन्नौज, हाथरस, आगरा, मेरठ, बदाय, बागपत, फिरोजाबाद, रामपुर, अलीगढ़, गाजियाबाद, इटावा आदि जिले आते हैं।

➤ राज्य में उत्पादन हेतु आलू को दूसरे प्रदेशों में ताज ब्राण्ड नाम से बेचा जाता है।

➤ आलू एवं अन्य शाक भाजियों के अनुसंधान के लिए गाजियाबाद में एक 'आलू अनुसंधान केंद्र' बाबूगढ़ स्थापित किया गया है।


हल्दी

➤ हल्दी उत्पादन में उत्तर प्रदेश अग्रणी स्थान रखता है। वैसे तो कई जिलों में हल्दी की खेती की जाती है। लेकिन विशेष रूप से बुंदेलखंड खेत्र में की जाती है।


प्याज और लहसुन

➤ सामान्यतः घरेलू उपयोग के लिए प्याज एवं लहसुन का उत्पादन प्रदेश के अधिकांश भागों में किया जाता है।

इसकी खेती फर्रुखाबाद, बदायूं, मैनपुरी, इटावा, कन्नौज, एटा, फिरोजाबाद आदि जिलों में की जाती है।


अदरख

➤ अदरख की खेती बुंदेलखंडीय जिलों में मुख्य रूप से की जाती है।


उत्तर प्रदेश में पुष्प उत्पादन


➤ प्रदेश में पुष्पों की खेती वाराणसी, कन्नौज,बमिर्जापुर, जौनपुर, प्रयागराज, लखनऊ आदि जिलों में की जाती है।

➤ पुष्पों के नर्सरी हेतु सरकार द्वारा की कई तरह के अनुदान दिये जाते हैं।

➤ भारत में स्थापित 9 आदर्श पुष्पोत्पादन केंद्रों में एक लखनऊ में है। कन्नौज में पुष्पों से इत्र बनाया जाता है।


औषध एवं सगंधोत्पादन

उत्तर प्रदेश में एलोवेरा (घृतकुमारी), ब्राह्मी, मेथा, तुलसी, सफेद मूसली, सतावरी, सर्पगंधा, शंखपुष्पी, नीम, अशोक, अर्जुन, बेल, कोंच, कालमेध, अश्वगंधा, पामा, रोजा, लेमनग्रास, जिरेनियम, खस, सदाबहार, ईसबगोल, सेना आदि औषधीय पौधों की खेती के लिए किसानों को अनेक तरह की सुविधाएं दी जा रही है।

➤ मेरठ तथा सहारनपुर मंडल में एलोवेरा, आंवला, अश्वगंधा, ब्राह्मी आदि की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

➤ शिवाला (मैंथा) पुदीना से मिलता-जुलता वनस्पति है। इसके पत्तों से आयल निकाला जाता है,जिससे कई औषधीय व उपयोगी पदार्थ बनाये जाते है।

➤ प्रदेश के बाराबंकी, बदायूं, रामपुर, कन्नौज, जालौन औरया, इटावा, एटा आदि पश्चिमी जिलों में इसकी खेती की जाती है।

➤ इस पौधे के पत्तियों के रस से पिपरमिंट बनाया जाता है। बाराबंकी, बदायू, रामपुर आदि जिलों में मेंथा तेल उद्योग स्थापित है।

➤ मैंथा ऑयल शुद्धता की जांच के लिए कन्नौज में फ्रेग्ररेंस एंड फ्लेवर डेवलपमेंट सेंटर को स्थापना की गई है।


पान उत्पादन

➤ प्रदेश में महोबा, बांदा, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़, बलिया, गाजीपुर, अमेठी, मिर्जापुर, सोनभद्र, ललितपुर, कानपुर, जौनपुर, प्रयागराज, लखनऊ, सुल्तानपुर, वाराणसी, आजमगढ़ सहित कुल लगभग 21 जिलों में पान की खेती की जाती है।

➤ राज्य में महोबा पान की खेती के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

➤ यहां पर 1981 में एक पान अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र की स्थापित किया गया

➤ महोबा के अलावा बरईमापुर (बांदा) क्षेत्र और पाली क्षेत्र (लखीमपुर) पान की खेती के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।


उत्तर प्रदेश में पशुपालन


➤ प्रदेश में पशु जनगणना 2012 के अनुसार प्रदेश में पशुओं की कुल संख्या 687.15 लाख है।

➤ राज्य में संपूर्ण देश के 13.41 प्रतिशत पशु हैं जो कि देश में सर्वाधिक है।

➤ राज्य के कुल पशुपालन में लगभग 195 लाख गोवंशीय पशु व लगभग 306 लाख महषिवंशीय पशु हैं। शेष में अन्य पशु सम्मिलित है।

➤ देश में उत्तर प्रदेश दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है।

➤ वर्तमान में प्रदेश में कुल 2202 पशु चिकित्सालय, 267 'द' श्रेणी के पशु औषधालय, 2576 पशु सेवा केंद्र, 5043 कृत्रिक गर्भाधान केंद्र तथा 3 अतिहिमाकृत वीर्य उत्पादन केंद्र है।

➤ इसके अतिरिक्त पशुओं की विशेष चिकित्सा के लिए 7 पशु चिकित्सा पॉलीक्लीनिक गोरखपुर, मुजफ्फरनगर, लखनऊ, बड़ौत (बागपत) व सैफई (इटावा) में पहले से कार्य कर रहे हैं।

➤ बादलपुर (गौतमबुद्ध नगर) में एक और पॉलीक्लीनिक की स्थापना की जा रही है। 

➤ पशु जैविक औषधि संस्थान, लखनऊ द्वारा पशु टीकों का उत्पादन किया जाता है।

➤ पशु विकास कार्यक्रम मूल रूप से उन्नत प्रजनन पर आधारित है। इसके लिए राज्य सरकार द्वारा उन्नत सांड, ➤ उन्नत वीर्य, तरल नत्रजन, एवं कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों की व्यवस्था की गयी है।

➤ प्रदेश में बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए भरारी (झांसी) में एक पशु चारा बैंक स्थापित किया जा रहा है। इस क्षेत्र में ग्रीष्म ऋतु में प्रायः चारा संकट उत्पन्न हो जाता है।

➤ गोवंशीय पशुओं को वध से उत्तर प्रदेश गोवंध निवारण अधिनियम, 1955 संरक्षण प्रदान करता है।

➤ 1999 में गोपालन को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग की स्थापना की गई थी।


दुग्ध विकास

➤ प्रदेश में दुग्ध संघों को आर्थिक एवं तकनीकी, सहायता उपलब्ध करने, मूल्य का निर्वारण करने तथा दुग्ध उत्पादन विनियमन आदेश को लागू कराने के उद्देश्य से 1976 में दुग्ध विकास विभाग तथा राज्य दुग्ध परिषद की स्थापना की गई।


उत्तर प्रदेश में पशुपालन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी


➤ उत्तर प्रदेश की प्रथम नियमित दुग्ध संघ की, स्थापना की गईलखनऊ (1998) में 

➤ राज्य में सर्वप्रथम तीन जिलों (वाराणसी, मेरठ व बलिया) में आपरेशन फ्लड शुरु किया गया1973

➤ राज्य दुग्ध परिषद की स्थापना की गई1976 में

➤ प्रादेशिक कोआपरेटिव डेरी फेडरेशन की स्थापना की गई1962 में

➤ गोकुल पुरस्कार योजना का संबंध हैदुग्ध

➤ राज्य में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता (2016-17) 348 ग्राम दिन

➤ 1970-71 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू किये गयेबआपरेशन फ्लड के तहत 1973 में राज्य के तीनों जिलों - वाराणसी, मेरठ और बलिया में आपरेशन फ्लड-1 शुरू किया गया।

➤ आपरेशन फ्लड-2 (1982-83 से 1987) तथा आपरेशन फ्लड-3 (1987 से 1996-97) तक चला। इसमें प्रदेश के 30 जिलों को सम्मिलित किया गया था। शेष जिलों में 1992 में दुग्ध संघों की स्थापना की गई थीं। वर्तमान में

➤ प्रदेश के कुल 59 दुग्ध संघ कार्यरत है।

➤ प्रदेश के 55 जिलों में 2012-13 से सघन मिनी डेरी परियोजना चलाई जा रही है।

➤ 2014-15 से केंद्र द्वारा दुग्ध विकास की राष्ट्रीय योजना चलाई जा रही है जिसमें कई कार्यक्रम सम्मिलित हैं।


उत्तर प्रदेश में दुग्ध उत्पादन संबंधी कार्यक्रम एवं संस्थाएं


महिला डेरी योजना

वित्तीय वर्ष 1996-97 से दुग्ध विकास विभाग द्वारा लागू इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण स्तर पर गठित दुग्ध समितियों से सम्बंद महिला दुग्ध उत्पादन सदस्यों को उनकी आय में वृद्धि हेतु दुग्ध विकास की विभिन्न गतिविधियों हेतु प्रशिक्षण दिलाया जाना तथा इस व्यवसाय में अतिरिक्त रोजगार की अभिरूति जगाना शामिल है। वर्तमान में इसके अंतर्गत 1196 महिला सहकारी दुग्ध उत्पादन समितियों का 31 जनपदों में गठन किया जा चुका है।


एकीकृत दुग्धशाला विकास परियोजना

यह एक शत-प्रतिशत केंद्र प्रायोजित (नान आपरेशन फ्लड) परियोजना है। इसका उद्देश्य राज्य के पिछड़े क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादन, उपार्जन, विपणन तथा रोजगार का सृजन करना है। इस परियोजना को प्रदेश में 1993-94 में लागू किया गया।


गोकुल पुरस्कार योजना

यह योजना सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों के अंतर्गत दुग्ध उत्पादकों को प्रोत्साहित करने हेतु चलाई जा रही है।


प्रोदेशिक को-आपरेटिव डेरी फेडरेशन

प्रदेश में दुग्ध व दुग्धशाला के विकास हेतु 1962 में इसका गठन किया गया था।

➤ आपरेशन फ्लड-1 इसी के तहत संचालित किया गया था।

➤ इस फेडरेशन के मुख्य कार्यों में ग्रामीण स्तर पर सहकारी दुग्ध समितियों का गठन व उनकेनमाध्यम से दुग्धउपार्जन, दुग्ध का संग्रहण, प्रसंस्करण, दुग्ध उत्पादन निर्माण एवं वितरण आदि अर्थात् प्री प्रोडक्शन टू प्रोस्टमार्केटिंग की समग्र व्यवस्था सम्मिलित है।

➤ नोएडा स्थित दुग्धशाला (नोएडा डेरी प्रोजेक्ट) इसी फेडरेशन के अंतर्गत है, जहां से दिल्ली को दूध की सप्लाई की जाती है।


उत्तर प्रदेश में कृषि से संबंधित योजनाएं/कार्यक्रम


किसान मित्र योजना

प्रदेश में किसानों को सभी तरह की जानकारियां उपलब्ध कराने के लिए प्रत्येक पंचायत में एक किसान मित्र (कृषि स्नातक इंटर) की नियुक्ति संबंधी यह योजना 18 जून, 2001 से शुरू की गई है।


नई कृषि नीति 2013

इस नीति में कृषि के विकास हेतु अनेक उपायों पर बल देते हुए कृषि क्षेत्र में 5.1 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया है।


किसान बही योजना

प्रदेश के 2.50 करोड़ जोत धारकों को उनकी जोतों की जानकारी कराने के उद्देश्य से पूर्ण प्रचालित जोत बही/पास बुक के स्वरूप परिवर्तन कर 1992 से यह योजना चलाई जा रही है।


आइसोपाम योजना

2004-05 में केंद्र द्वारा दलहनी, तिलहनी, मक्का आदि फसलों के लिए अलग-अलग चलाई जा रही योजनाओं को सम्मिलित कर इंटीग्रेटेड स्कीम ऑफ ऑयल, पल्सेज, मेज एंड ऑयलपाम नामक यह योजना शुरू की गई।


किसान वृद्धावस्था पेंशन योजना

प्रदेश सरकार द्वारा इस योजना को 2 अक्टूबर, 2003 से किया गया। इसमें 60 वर्ष से ऊपर और सवा तीन एकड़ भूमि तक के किसानों को 400 रुपये मासिक पेंशन देने की व्यवस्था है।


कृषि पार्क

किसानों को उनके उत्पादों का उचित दाम दिलाने के लिए सरकार द्वारा हापुड़, लखनऊ वाराणसी तथा सहारनपुर में कृषि पार्क स्थापित किया गया हैं।


किसान क्रेडिट कार्ड

किसानों को कृषि कार्यों हेतु ऋण उपलब्ध कराने संबंधी यह योजना 1999-2000 से संचालित है।

समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम 47 जिलों के 132 ब्लाकों में यह कार्यक्रम केंद्र व राज्य सरकार के सहयोग से 1991-92 से चलाई जा रही है।


उत्तर प्रदेश की कृषि योजनाएं संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी


➤ 2013 में प्राख्यापित नई कृषि नीति में राज्य में कृषि विकास दर का लक्ष्य रखा गया है 5.% वार्षिक

➤ उ.प्र. अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम (सीलिंग कानून) 1960 से प्रदेश में कृषि विज्ञान केन्द्र हैं69 संचालित 20 निर्माणाधीन

➤ किसान रथ योजना (दूर के किसानों को विविध जानकारी देने हेतु) 2013-15 से

➤ किसान मित्र योजना (कृषि सम्बंधी जानकारी हेतु) 8 जून 2001 से किसान बही योजना की शुरूआत1992

➤ किसान क्रेडिट कार्ड योजना 1999-2000

➤ प्रमुख आईसोपाम योजना (दलहनी, तिलहनी आदि हेतु अलग से) 2004-05 से

➤ ग्रामीण खाद्य बैंक योजना 2007 से समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम1999-92 से

➤ हर्वल गार्डन योजना (लुप्त हो रही औषधीय पौधों को बढ़ावा)2009-03 से

➤ 2074-5 से एकीकृत बागवानी विकास मिशन योजना चल रही है45 जिलों में

➤ उत्तर प्रदेश आलू नीति प्रख्यापित की गई: राज्य में जैविक खेती हेतु मॉडल के रूप में चयनित जिला हैहमीरपुर

➤ राज्य के 5 जिलों में जैविक कृषि हेतु स्थापित कराए गए हैं575 क्लस्टर

➤ वर्ष 2022 तक कृषकों की आय दोगुना करने हेतु कार्यवाही की जा रही है8 सूत्री रणनीति पर

➤ कृषकों की आय दोगुनी करने की रणनीति के तहत कृषि उत्पादकता के आधार पर प्रदेश के जिलों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है19 (जिलों), विकासशील (40 जिले) व कम विकसित (16 जिले)


खाद्य पार्क

खाद्य पार्क की स्थापना नोएडा में की गई है।


ऊसर भूमि सुधार परियोजना

राज्य भूमि सुधार निगम द्वारा यह परियोजना उन्नाव, अलीगढ़, प्रतापगढ़, जौनपुर, प्रयागराज आदि 29 जिलों के 125 ब्लाकों में चला जा रही है।


किसान सेवा रथ

जनपद मुख्यालय से सुदूर निवास करने वाले कृषकों को कृषि सम्बंधी संपूर्ण जानकारी ने के लिए यह सेवा 2010-11 में शुरू की गई है।


राष्ट्रीय कृषि व मौसम आधारित फसल बीमा योजना

कृषि उत्पादन में शामिल जोखिमों से किसानों के हितों की रक्षा हेतु केंद्र के सहयोग से 1999-2000 में शुरू की गई राष्ट्रीय कृषि बीमायोजना को 2010-11 में कुछ संशोधनों के साथ 'संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना' के नाम से लागू किया गया था। फरवरी, 2014 से इसे संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा व मौसम आधारित फसल बीमा योजना के नाम से संचालित किया जा रहा है।


कृषि निर्यात जोन

इस समय प्रदेश में आम और आलू के निर्यात के लिए तीन जोन हैं-

(1) आगरा (आलू) - इस क्षेत्र में आगरा, फर्रुखाबाद, कन्नौज, हाथरस, मेरठ आदि जिले सम्मिलित हैं।

(2) लखनऊ (आम) - इसमें लखनऊ, सीतापुर, बाराबंकी, हरदोई एवं उन्नाव जिले हैं।

(3) सहारनपुर (आम) - इसमें सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर एवं बुलंदशहर आदि जिले सम्मिलित हैं।


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