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उत्तर प्रदेश का इतिहास सामान्य ज्ञान | Uttar Pradesh History GK in Hindi

उत्तर प्रदेश का इतिहास सामान्य ज्ञान | Uttar Pradesh History GK in Hindi

नमस्कार दोस्तों, Exams Tips Hindi शिक्षात्मक वेबसाइट में आपका स्वागत है। इस आर्टिकल में उत्तर प्रदेश के इतिहास से संबंधित जानकारी (Uttar Pradesh History GK) दी गई है। जैसा कि हम जानते है, उत्तर प्रदेश, भारत का जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश की प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत ज़्यादा कम्पटीशन रहता है। यह लेख उन आकांक्षीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो उत्तर प्रदेश सिविल सर्विस (UPPSC), UPSSSC, विद्युत विभाग, पुलिस, टीचर, सिंचाई विभाग, लेखपाल, BDO इत्यादि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है। तो आइए जानते है उत्तर प्रदेश से संबंधित जानकारी-


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उत्तर प्रदेश का इतिहास सामान्य ज्ञान | Uttar Pradesh History GK in Hindi

उत्तर प्रदेश का प्राचीन इतिहास


ऐतिहासिक घटनाओं का तीन भागों- प्रागैतिहासिक काल, आद्य ऐतिहासिक काल तथा इतिहास काल में वर्गीकृत करके अध्ययन किया जाता है।

जिस काल की घटनाओं का कोई लिखित विवरण प्राप्त नही होता उसे 'प्रागैतिहासिक काल' कहते है।

जिस काल के, लेखन-कला के प्रचलन के बाद भी उपलब्ध लेख नहीं पढ़ें जा सके है उसे 'आद्य ऐतिहासिक काल' कहा जाता है।

मानव विकास के उस काल को 'इतिहास' कहा जाता है जिसका विवरण लिखित रूप में उपलब्ध है।


प्रागैतिहासिक काल (पाषाण काल) पाषाण काल को तीन भागों में विभक्त किया जाता है-

1.  पुरापाषाण काल  2. मध्यपाषाण काल तथा 3.नवपाषाण काल।


1. पुरापाषाण काल

पुरातत्व विज्ञानी रॉबर्ट ब्रुस फुट पहले व्यक्ति थे जिन्होंन 1863 ई. में भारत के तमिलनाडु के पल्लावरम् नामक स्थान पर पुरापाषाणकालीन औजारों की खोज की।

पुरापाषाण काल के मानवों की जीविका का मुख्य आधार शिकार था।

आग का अविष्कार पुरापाषाण काल मे ही हुआ।

उत्तर प्रदेश में पुरापाषणकालीन सभ्यता के साक्ष्य बेलन घाटी (प्रयागराज), सिंगरौली घाटी (सोनभद्र) तथा चकिया (चन्दौली) से प्राप्त हुए है।

प्रयागराज विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. जी. आर. शर्मा के निर्देशन में प्रदेश में अवस्थित बेलन नदी घाटी के पुरास्थलों की खोज और खुदाई कराई गई।

बेलन नदी घाटी के लोहदा नाला क्षेत्र से पाषाणकालीन उपकरणों के साथ-साथ अस्थि निर्मित मातृदेवी की प्रतिमा भी प्राप्त हुई है।

उल्लेखनीय है कि भारत में पुरापाषाणकालीन अधिकांश औजार स्फटिक (पत्थर) के बने थे।


2. मध्य पाषाण काल

मध्यपाषाण कालीन सभ्यता के साक्ष्य उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर व सोनभद्र जनपद के मोरहना पहाड़, लेखहिया तथा बघहीखोर प्रयागराज के मेजा, बारा, करछाना, फुलपुर तथा कोरांव और प्रतापगढ़ जनपद केसरायनाहर, महदहा तथा दमदमा से प्राप्त हुआ है।

सरायनाहर (प्रतापगढ़, जनपद) में 15 शवाधान मिले हैं, जिनमें मृतक का सिर पश्चिम दिशा की ओर है।

प्रयागराज जनपद के मेजा तहसील मे चोपनी माण्डों से मध्यपाषाणकालीन झोपडियों तथा मिट्टी के बर्तनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

मध्यपाषाणकालीन उपकरणों के साथ-साथ गर्त चूल्हे, सिले-लोढ़े तथा अस्थि व सींग के आभूषण प्रतापगढ़ जनपद के महदहा से प्राप्त हुए है।


3. नवपाषाण काल

नवपाषाण काल में मानव में स्थायी निवास की प्रवृति विकसित हुई। इस काल के मानव ने सर्वप्रथम कुत्ते को पालतू बनाया।

कृषि तथा पहिए का आविष्कार नवपाषाण काल में हुआ।

कृषि का प्रथम उदाहरण मेहरगढ़ (पश्चिमी बलूचिस्तान) से प्राप्त हुआ है।

उत्तर प्रदेश में नवपाषाणकालीन सभ्यता के साक्ष्य प्रयाजराज (बेलन घाटी स्थित कोलडिहवा, महदहा तथा पंचोह), मिर्जापुर, सोनभद्र तथा प्रतापगढ़ जनपदों से प्राप्त हुए हैं।

बेलन घाटी स्थित कोलडिहवा का संबंध धान (चावल) की खेती के प्राचीनतम साक्ष्य से है।

यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों की सतहों पर चावल के दाने, भूसी व फल के अवशेष चिपके हुए मिले है।

इस काल का मानव जानवरों की खालों से बने वस्त्र तथा चित्रकला के ज्ञान से परिचित हो चुका था।

क्रान्तिकारी सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक, सांस्कृतिक परिवर्तनों एवं विकास होने के कारण ही इसे गार्डन वी. चाइल्ड ने इस काल को 'नवपाषाण क्रान्ति' की संज्ञा दी है।


आध-ऐतिहासिक काल

आध ऐतिहासिक काल को ताम्र पाषाण काल तथा कांस्य युग में विभाजित किया जाता है।


ताम्र पाषाण काल

मनुष्य ने सर्वप्रथम ताँबा धातु का प्रयोग ताम्र पाषाण काल में ही किया तथा उसके द्वारा बनाया जाने वाला प्रथम औजार कुल्हाड़ी था।

ताम्र पाषाणिक संस्कृति में पाषाण (पत्थर) तथा ताँबे के उपकरणों का प्रयोग साथ-साथ किया गया।

उत्तर प्रदेश में मेरठ तथा सहारनपुर जनपद से ताम्र पाषाणिक संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहाँ से मिले साक्ष्यों के आधार पर इस संस्कृति का काल 1500-700 ई. पू. माना जाता है।

प्रदेश में ऊपरी गंगा घाटी तथा गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र के विभिन्न स्थलों से ताम्र पाषाण काल के मृदभाण्ड और ताम्रनिधियाँ प्राप्त हुई हैं।


सिन्धु सभ्यता (कांस्य युग)

सिन्धु सभ्यता कांस्य युग का प्रतिनिधित्व करती है।

सन् 1921 में सिन्धु सभ्यता की खोज 'रायबहादपुर दयाराम साहनी' ने की थी।

इस सभ्यता के ज्ञात स्थलों में सबसे पहले हड़प्पा का पता चला। इसलिए, इस प्रथम ज्ञात स्थल के आधार पर इसे हड़प्पा सभ्यता संस्कृति भी कहते हैं।

रेडियोकार्बन C14 विश्लेषण-पद्धति वं द्वारा सिन्धु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2400 ई. पू. से 1700 ई.पू. मानी गयी है।

उत्तर प्रदेश में सिन्धु सभ्यता के साक्ष्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में आलमगीरपुर (मेरठ), बडागाँव तथा हुलास (सहारनपुर) आदि स्थलों से प्राप्त हुए है।

हिण्डन नदी के तट पर अवस्थित आलमगीरपुर की खोज सर्वप्रथम 'भारत सेवक समाज' द्वारा की गई थी। इसका उत्खनन कार्य यज्ञदत्त शर्मा के निर्देशन मे वर्ष 1958 में किया गया था।

उत्तर प्रदेश में नई खोजों के अनुसार सैन्धव सभ्यता के साक्ष्य बुलदशहर जनपद के भटपुरा व मानपुरा, मुजफ्फनगर जनपद के मांडी गाँव व कैराना क्षेत्र तथा सनौली (जनपद बागपत) से प्राप्त हुए हैं।


ऐतिहासिक काल (लौह काल)

उत्तर प्रदेश में लौहयुगीन संस्कृति के साक्ष्य श्रावस्ती, अहिच्छत्र, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, मथुरा, काम्पिल्य आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर में चित्रित धूसर भाण्ड के प्रमाण मिले हैं।

हस्तिनापुर एवं अंतरजीखेड़ा की खुदाई से लौह धातुमल तथा भटिठयाँ प्राप्त हुई है, जो यह स्पष्ट करती हैं कि यहाँ के निवासी लोहे को गलाकर इससे विभिन्न प्रकार के उपकरणों के निर्माण में निफण थे।


वैदिक सभ्यता

भारत में जिस नवीन सभ्यता का उदय सिन्धु सभ्यता के पतन के पश्चात हुआ उसे वैदिक सभ्यता' या आर्य सभ्यता' के नाम से जाना जाता है।

आर्यों द्वारा निर्मित सभ्यता वैदिक सभ्यता कहलायी।

मैक्समूलर ने आर्यों का मूल निवास स्थान मध्य एशिया को माना है।

आर्यों द्वारा विकसित सभ्यता ग्रामीण सभ्यता तथा आर्यों की भाषा संस्कृत थी।

आर्यों द्वारा खोजी गई धातु लोहा थी, जिसे श्याम अयस् कहा जाता था। ताँबे को लोहित अयस् कहा जाता था।

ऋग्वैदिक काल में आर्य सभ्यता केवल पंजाब तथा सिन्ध क्षेत्रों में ही सीमित थी, जहाँ पंचजनों का निवास था।

पंचजनों में फरू, तुर्वसु, यदु, अनु और द्रुह्य सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त एक और प्रमुख वर्ग था, जो 'भरत' कहलाता था।

उत्तर वैदिककालीन संस्कृति का मुख्य केन्द्र वर्तमान उत्तर प्रदेश था, जो उस समय 'मध्य देश' कहलाता था।

'मध्य देश' का विस्तार सरस्वती नदी से लेकर गंगा नदी के दोआब क्षेत्र तक था।

मध्य देश में कुरु और पांचाल जैसे विशाल कुरु राज्य की राजधानी आसंदीवत् थी तथा इस राज्य का विस्तार मेरठ, दिल्ली तथा थानेश्वर तक था।

कुरू राज्य के राजा परीक्षित और जनमेजय थे।

पांचाल राज्य की राजधानी काम्पिल्य थी तथा इस राज्य का विस्तार बरेली, फर्रुखाबाद, बदायूँ आदि क्षेत्रों तक था।

कुरु-पंचाल क्षेत्र भारद्वाज, याज्ञवल्य, वशिष्ट, विश्वामित्र, बाल्मीकि आदि महान ऋषियों के तपस्थली रहे हैं।

उत्तर वैदिककालीन लाल मृद्भाण्डों के अवशेष संपूर्ण उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुए हैं।

उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी नगर में प्रथम बार पक्की ईटों का प्रयोग किया गया था।

गोत्र नामक संस्था का जन्म उत्तरवैदिक काल में हुआ था।


महाकाव्य काल

महाकाव्य काल उत्तर वैदिक काल के अंतिम चरण को कहा जाता है।

महाकाव्य दो हैं- रामायण एवं महाभारत।

'रामायण' की रचना महर्षि वाल्मीकि ने ब्रह्मावर्त (बिठूर-कानपुर) में की थी।

'रामायण' की कथा कौशल (अयोध्या) राज्य के इक्ष्वाकु वंश से संबंधित है।

'महाभारत' की रचना महर्षि वेद व्यास ने की। महाभारत का पुराना नाम 'जयसंहिता' था। यह विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है।

'महाभारत' की कथा हस्तिनापुर के कुरु वंश से संबंधित है।

महाकाव्य काल के समय के विशाल राज्यों में कुरु, पांचाल, कौशाम्बी, कोशल, काशी, विदेह, मगध, अंग आदि थे।


महाजनपद काल

बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तरनिकाय के अनुसार छठी शताब्दी ईसा पूर्व में संपूर्ण भारतवर्ष 16 बड़े महाजनपदों में बँटा हुआ था।

16 बड़े महाजनपदों में से 8 महाजनपद क्रमशः कुरु, पांचाल, शूरसेन, वत्स, कोशल, मल्ल, काशी तथा चेदि वर्तमान उत्तर प्रदेश में ही स्थित थे।

कोशल महाजनपद अवध क्षेत्र मे स्थित था, जिसमें उत्तरी कोशल की राजधानी साकेत (अयोध्या) और दक्षिणी कोशल की राजधानी श्रावस्ती थी

कोशल (अवध) का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में हुआ है। 

कुरु महाजनपद मेरठ से दिल्ली तक विस्तृत था, जिसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी।

पांचाल महाजनपद बरेली, बदायूँ और फर्रुखाबाद क्षेत्र में स्थित था। पांचाल महाजनपद के उत्तरी भाग की राजधानी अहिच्छत्र तथा दक्षिणी भाग की राजधानी कांपिल्य थी।

महाजनपद युग में संकिसा (फर्रुखाबाद के समीप स्थित) पांचाल महाजनपद में प्रमुख नगर था।

वर्तमान मथुरा के समीपवर्ती क्षेत्र में स्थित शूरसेन महाजनपद की राजधानी मथुरा थी।

वत्स महाजनपद जो प्रयागराज के समीपवर्ती क्षेत्र में स्थित था, की राजधानी कोसम (वर्तमान कौशाम्बी क्षेत्र) थी मल्ल महाजनपद (देवरिया-गोरखपुर क्षेत्र) की राजधानी (कसिया) तथा पावा (पडरौना) थी।

उत्तर प्रदेश क्षेत्र के अन्तर्गत इन 8 महाजनपदों के अतिरिक्त 2 और गणराज्य क्रमश: कपिलवस्तु के शाक्य और समसुमेरगिरी (चुनार) के भाग थे।


जैन धर्म

छठी शताब्दी ई. पू. भारतवर्ष में दो नये धर्मों (जैन तथा बौद्ध) का उदय हुआ जिनका मध्य देश (उत्तर प्रदेश) पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

जैन धर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे।

जैन धर्म के 24 वे एवं अंतिम तीर्थकर महावीर स्वामी का जन्म कुण्डलग्राम (वैशाली, बिहार) में हुआ था, लेकिन उत्तर प्रदेश में उनके अनुयायियों की संख्या अधिक थी।

महावीर स्वामी के पिता सिद्धार्थ 'ज्ञातृक कुल' के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छवी राजा चेटक की बहन थी।

महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्द्धमान, पत्नी का नाम यशोदा एवं पुत्री का नाम अनोज्जा प्रियदर्शनी था।

महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की अवस्था में माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने बड़े ; भाई नंदिवर्धन से अनुमति लेकर संन्यास-जीवन को स्वीकार था।

12 वर्षों की कठिन तपस्या के पश्चात् महावीर स्वामी को शृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए ज्ञान का बोध हुआ। इसी समय से महावीर स्वामी जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य) और निग्रंथ (बंधनहीन) कहलाए।


जैन संगीतियाँ

मौर्योत्तर युग में मथुरा (उत्तर प्रदेश) जैन धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र था।

मथुरा से जैन धर्म से संबंधित अनेक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

मथुरा कला का संबंध जैन धर्म से है।

कुषाण काल में भी मथुरा जैन धर्म का समृद्ध केन्द्र था।

468 ई. पू. बिहार राज्य के पावापुरी (राजगीर) में मल्लराजा सृस्तिपाल के राजप्रसाद मे 72 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था।


बौद्ध धर्म

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी नामक स्थान पर 563 ई. पू. में हुआ था।

गौतम बुद्ध के पिता शुद्धोधन एक छोटे गणराज्य कपिलवस्तु के निर्वाचित राजा और शाक्य गणराज्य के प्रधान थे।

कपिलवस्तु वर्तमान उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जनपद में अवस्थित है।

गौतम बुद्ध की माता का नाम माया देवी था जो राम ग्राम (गोरखपुर) के कोलिय गणराज्य की कन्या थी।

बिना अन्न-जल ग्रहण किए 6 वर्षों की कठिन तपस्या के पश्चात् 35 वर्ष की अवस्था में वैशाख पूर्णिमा की रात पीपल वृक्ष के नीचे निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे सिद्धार्थ को ज्ञान की प्राप्ति हुई।

ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् सिद्धार्थ 'बुद्ध' के नाम से जाने गए तथा वह स्थान जहाँ उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई 'बोधगया' कहलाया।

बुद्ध ने अपना पहला उपदेश उत्तर प्रदेश के सारनाथ में दिया, जिसे बौद्ध ग्रथों में 'धर्म चक्र-प्रवर्तन' कहा गया है।

बुद्ध के प्रमुख अनुयायी शासकों में बिम्बिसार, प्रसेनजित तथा उदयिन प्रमुख थें।

महात्मा बुद्ध ने मध्यम मार्ग (मध्यम-प्रतिपद) का उपदेश दिया।

बुद्ध ने अपने उपदेश ‘पालि' भाषा में दिए।

बुद्ध ने अपने उपदेश कोशल, वैशाली, कौशाम्बी एवं अन्य राज्यों में दिए। लेकिन उन्होंने अपने सर्वाधिक उपदेश कोशल देश की राजधानी श्रावस्ती में दिए।

483 ई.पू. 80 वर्ष की अवस्था में कुशीनारा (देवरिया, उत्तर प्रदेश) में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के पश्चात् महात्मा बुद्ध की मृत्यु हो गयी, जिसे बौद्ध धर्म में 'महापरिनिर्वाण' कहा गया है।

महात्मा बुद्ध को 'एशिया का ज्योति फंज' (Light of Asia) कहा जाता है।

गौतम बुद्ध का अधिकांश संन्यासी जीवन उत्तर प्रदेश में ही व्यतीत होन के कारण इस प्रदेश को 'बौद्ध धर्म का पालना' कहा जाता है।

सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण 'गन्धार शैली' के अन्तर्गत किया गया, लेकिन बुद्ध की प्रथम मूर्ति संभवतः 'मथुरा कला' के अन्तर्गत बनी थी।

बुद्ध काल में उत्तर प्रदेश में 7 मुख्य गणराज्य थे। ये हैं-1. कपिलवस्तु के शाक्य, 2. सुमसुमार पर्वत (चुनार) के भाग, 3. केलपुत्रके कालाम 4. रामग्राम के कोलिय, 5. कुशीनगर के मल्ल, 6. पावा के मल्ल तथा 7. पिप्पलिवन के मोरिय।

बौद्ध काल में उत्तर प्रदेश के नगरों का तेजी से विकास हुआ। प्रदेश में उस समय काशी, कौशाम्बी, मथुरा, साकेत, श्रावस्ती, हस्तिनापुर, अहिक्षत्र आदि प्रमुख नगर थे।


वैष्णव धर्म

वैष्णव धर्म के प्रवर्तक कृष्ण थे, जो वृषण कबीले के थे और उनका निवास स्थान मथुरा (उत्तर प्रदेश) था।

कृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम 'छांदोग्य उपनिषद्' में देवकी-पुत्रऔर अंगिरस के शिष्य के रूप में हुआ है।

उत्तर प्रदेश में मथुरा से ब्राह्मण धर्म के देवी-देवताओं जैसे-विष्णु, वासुदेव, सूर्य, कार्तिकेय, वराह, दुर्गा, लक्ष्मी आदि की प्राचीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई है।

उत्तर प्रदेश में सोंख (मथुरा) नामक स्थान से हाल ही में खुदाई के दौरान कुषाणकालीन मंदिर मिला है, जो ब्राह्मण धर्म का घोतक है।

मथुरा (उत्तर प्रदेश) को 'भारतीय मूर्तिकला का जन्म स्थल' कहा जाता है।


मगध राज्य का उत्कर्ष

बिहार राज्य के पटना तथा गया जनपदों में विस्तृत मगध प्राचीन भारत का एक महत्त्वपूर्ण राज्य था।

मगध साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक बिम्बिसार (हर्यक वंश) था।

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार 544 ई. पू. में बिम्बिसार मगध की गद्दी पर बैठा था। वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था।

बिम्बिसार ने वैवाहिक संबध स्थापित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

बिम्बिसार ने कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला से, वैशाली के चेटक की पपुत्री चेल्लना से तथा भद्र देश (आधुनिक पंजाब) की राजकुमारी मा से शादी की।

493 ई. पू. में बिम्बिसार की हत्या कर उसका पपुत्रअजातशत्रु मगध की गद्दी पर बैठा। इसने बिहार के साथ-साथ आधे उत्तर प्रदेश पर भी आधिपत्य कर लिया था।

हर्यक वंश का अंतिम राजा उदायिन का पुत्र नागदशक था।

412 ई.पू. नागदशक को उसके अमात्य शिशुनाग ने अपदस्थ करके मगध पर शिशुनाग वंश की स्थापना की।

शिशुनाग ने पाटिलपुत्रसे अपनी राजधानी हटाकर वैशाली में स्थापित की।

मगध साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली राजा नंद वंश का संस्थापक 'महापद्यनंद' था।

महापद्यनंद के समय में मगध साम्राज्य का विस्तार उत्तर भारत के साथ ही गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, कर्नाटक तथा ओडिशा तक था।

महापद्यनंद के समय में ही भारत पर सिकन्दर का आक्रमण हुआ था, लेकिन उसकी सेना ने व्यास नदी के पश्चिमी तट पर पहुँच कर उसे पार करने से इन्कार कर दिया।

नंद वंश का अंतिम शासक घनानंद था। यह सिकन्दर का समकालीन था। इसे चन्द्रगुप्त मौर्य ने युद्ध में पराजित किया और मगध पर एक नये वंश 'मौर्य वंश' की स्थापना की।


मौर्य साम्राज्य


चंद्रगुप्त मौर्य

मौर्य वंश की स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने की। घनानंद को हराने में चाणक्य (कौटिल्य/ विष्णुगुप्त) ने चन्द्रगुप्त मौर्य की मदद की थी, जो बाद में चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री बना।

चाणक्य द्वारा लिखित पुस्तक 'अर्थशास्त्र' है जिसका संबंध राजनीति से है।

322 ई. पू. चन्द्रगुप्त मौर्य मगध की गद्दी पर बैठा।

चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयायी था। इसने जैनी गुरू भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा ली थी।

चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपना अंतिम समय कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया। यहीं पर 298 ई. पू. में उपवास के द्वारा इनकी मृत्यु हो गयी।


बिन्दुसार

चन्द्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिन्दुसार 298 ई.पू. में मगध की राजगद्दी पर बैठा बिन्दुसार को अमित्रघात (शत्रु विनाशक) के नाम से भी जाना जाता है।

बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।


अशोक

269 ई.पू. मगध की राजगद्दी पर अशोक महान बैठा।

अशोक ने अपने अभिषेक के 8 वें वर्ष लगभग 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया।

अशोक के इतिहास का स्रोत उसके अभिलेख हैं। उसके अभी तक 40 से भी अधिक अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं।

अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक एवं अरमाइक लिपि का प्रयोग हुआ।

ग्रीक तथा अरमाइक लिपि का अभिलेख अफगानिस्तान से, खरोष्ठी लिपि का अभिलेख उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान से तथा ब्राह्मी लिपि के अभिलेख शेष भारत से मिले हैं।

उत्तर प्रदेश में अशोक के प्रमुख अभिलेख इस प्रकार हैं- टोपरा (खिज्राबाद-सहारनपुर) का स्तंभ-लेख, कौशाम्बी का स्तंभ-लेख, मेरठ का स्तंभ-लेख सारनाथ का लघु शिलालेख तथा अहरौरा (मिर्जापुर) का लघु शिलालेख।

कौशाम्बी अभिलेख को 'रानी का अभिलेख' कहा जाता है।

सारनाथ स्तंभलेख के शीर्ष पर बने सिंहो की आकृति को ही भारत सरकार ने अपना 'राजकीय चिद्म बनाया है।

अशोक का सबसे छाटा स्तंभ-लेख रुम्मिदेई है। इसी में लुम्बिनी में धम्म-यात्रा के दौरान अशोक द्वारा भू-राजस्व की दर घटा देने की घोषणा की गई है।

अशोक कालीन पाषाण कलाकृतियों तथा लेखों का निर्माण चुनार (मिर्जापुर) के बलुए पत्थर से किया गया है।

चीनी यात्री हेनसांग ने उत्तर प्रदेश के मथुरा, कन्नौज, कौशाम्बी, काशी आदि स्थानों पर अशोक-कालीन अनेक स्तूपों के होने का उल्लेख किया है।

सारनाथ का 'धर्मराजिका स्तूप' आज भी विद्यमान है।


शुंग वंश

पुष्यमित्र शुंग ने 1855 ई.पू. मगध में 'शुंग वंश' की नीव डाली।

शुंग शासकों ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्रकी जगह विदिशा में स्थापित की।

इन्डो-यूनानी शासक मिनांडर को पुष्यमित्र शुंग ने पराजित किया था।

अयोध्या के शिलालेख से यह पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण धर्मानुयायी था तथा इसने पतंजलि की अध्यक्षता में दो बारअश्वमेघ यज्ञ करवाया था।

भरहूत (सतना) स्तूप का निर्माण पुष्यमित्र शुंग ने करवाया।

शुंगकालीन साम्राज्य की सीमा चन्द्रगुप्त मौर्य के समान थी।

शुंग काल में उत्तर प्रदेश में संस्कृत भाषा, स्थापत्य कला तथा ब्राह्मण धर्म का फनरुत्थान हुआ।


हिन्द-यवन (इण्डो-ग्रीक) आक्रमण

ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी के आरंभ में हिंद-यूनानियों ने पश्चिमोत्तर भारत के एक विशाल भू-भाग पर कब्जा कर लिया था।

पतंजलि के 'महाभाष्य' से पता चलता है कि यवनों ने साकेत को घेर लिया था तथा वे गंगा की घाटी में बहुत आगे तक बढ़ आये थे।

हिंद-यूनानी शासकों में सबसे अधिक विख्यात मिनान्डर (165-145ई.पू.) हुआ। इसकी राजधानी शाकल (आधुनिक सियालकोट) शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था।

मिनान्डर का साम्राज्य झेलम से मथुरा तक विस्तृत था।

भारत में सर्वप्रथम हिंद-यूनानियों ने ही सोने के सिक्के जारी किए थे।

हिंद-यूनानी शासकों ने भारत के पश्चिमोत्तर सीमा-प्रांत में यूनान की प्राचीन कला चलाई, जिसे 'हेलेनिस्टिक आर्ट' कहते हैं। भारत में गंधार कला इसका उत्तम उदाहरण है। मथुरा कला में भी इनके कुछ प्रभाव दिखते हैं।


शक

शक मूलतः मध्य एशिया के निवासी थे और ईरान से होकर चारागाह की खोज में भारत आए थे।

शकों की पाँच शाखाएँ थी और हर शाखा की राजधानी भारत और अफग़ानिस्तान में अलग-अलग भागो में थी। पहली शाखा ने अफग़ानिस्तान, दूसरी शाखा ने पंजाब (राजधानी-तक्षशिला), तीसरी शाखा ने मथुरा, चौथी शाखा ने पश्चिमी भारत तथा पाँचवीं शाखा ने ऊपरी दक्कन पर प्रभुत्व स्थापित किया।

मथुरा शाखा का प्रथम क्षत्रप राजूल था जिसका उलेख मोरा (मथुरा) से प्राप्त ब्रह्मी में उत्कीर्ण लेख में हुआ है।

मथुरा मे शकों का शासन पूर्वी पंजाब से मथुरा तक विस्तृत था।


कुषाण वंश

भारत में कुषाण चीन के सीमावर्ती प्रदेशो से आए, जो यू-ची एवं तोखरी भी कहलाते है। यू-ची नामक एक कवीला पाँच कुलों में बँटा था, उन्हीं में एक कुल कुषाण था।

कुषाणों ने पश्चिमोत्तर भारत के पार्थियनों, पल्लवों और आगे शकों को परास्त कर भारत में 'कुषाण वंश' की स्थापना की।

कुषाण वंश का संस्थापक कुजुल कडफिसेस था। इसके बाद विम कडफिसेस ने सत्ता संभाली।

कुषाण वंश का सबसे प्रतापी राजा कनिष्क था। इसकी राजधानी पुरुषपुर या पेशावर थी। इसका साम्राज्य गंधार से अवध और वाराणसी तक विस्तृत था।

आरंभिक कुषाण शासकों ने भारी संख्या में स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं, जिनकी शुद्धता गुप्त काल की स्वर्ण मुद्राओं से उत्कृष्ट है।

कुषाण कालीन सिक्के मथुरा तक मिलते हैं जिनपर शिव, नन्दी तथा त्रिशूल की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं।

उत्तर प्रदेश के विस्तृत भागों में मिले सिक्के और उत्कीर्ण प्रलेखों से यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र किसी समय कुषाण साम्राज्य का अंग था।

कुषाण काल में मथुरा व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था।

गांधार शैली एवं मथुरा शैली का विकास कनिष्क के शासनकाल में हुआ था।

तीसरी सदी आते-आते कुषाणों का प्रभुत्व मध्य देश (उत्तर प्रदेश) से समाप्त हो चुका था और अनेक छोटे-छोटे राज्य उभरने लगे।


गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अन्त में प्रयाग के निकट कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश) में हुआ।

गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त (240-280ई) था।

चन्द्रगुप्त प्रथम ने मगध की सीमा को काशी तथा कोशल तक बढ़ाया।

गुप्त संवत् (319-320 ई.) की शुरुआत चन्द्रगुप्त प्रथम ने की।

चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त हुआ, जो 335 ई. में राजगद्दी पर बैठा।

इसने आर्यावर्त के 9 शासकों और दक्षिणावर्त के 12 शासकों को पराजित किया। इन्ही विजयों के कारण इसे 'भारत का नेपोलियन' कहा जाता है।

समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिषेण था, जिसने इलाहाबाद प्रशस्ति (प्रयाग प्रशस्ति) की रचना की। इस लेख में उत्तरापथ एवं दक्षिणापथ अभियानों का उल्लेख किया गया है।

उत्तरापथ के 12 राज्यों में 4 उत्तर प्रदेश में अवस्थित हैं। अतः स्पष्ट है कि संपूर्ण उत्तर प्रदेश गुप्त साम्राज्य का अंग था।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थलों से निम्नलिखित गुप्तकालीन अभिलेख प्राप्त हुए है:-

1. बिलसद अभिलेख (एटा) 2. गढ़वा के अभिलेख (प्रयागराज) 3. करमदण्डा अभिलेख (फैजाबाद) 4. मनकुँवर अभिलेख (प्रयागराज) 5. मथुरा का शिलालेख (मथुरा) 6. भीतरी स्तंभलेख (गाजीपुर) 7. कहौम स्तंभ लेख (गोरखपुर)।

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की थी।

मंदिर बनाने की कला का जन्म गुप्तकाल में ही हुआ।

गुप्तकाल में वैष्णव धर्म संबंधी सर्वाधिक महत्त्वूर्ण अवशेष उत्तर प्रदेश के ललितपुर जनपद में अवस्थित 'देवगढ़ का दशावतार मंदिर' है।

देवगढ़ का दशावतार मंदिर बेतवा नदी के तट पर अवस्थित है। नागर शैली में बना यह मंदिर भारत में शिखर मंदिर का पहला उदाहरण है।

प्रभाकरवर्द्धन की पुत्री राज्यश्री का विवाह उत्तर प्रदेश के भीतरगाँव (कानपुर), भीतरी गाजीपुर, देवगढ़ (झाँसी) से गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए है।

उत्तर प्रदेश में भीतरगाँव (कानपुर) स्थित गुप्तकालीन लक्ष्मण मंदिर ईंटों द्वारा निर्मित है जो एक वर्गाकार चबूतरे पर बना है। यह मंदिर शिखर युक्त है, जिसका शिखर लगभग 70 फीट ऊँचा है।


गुप्तोत्तर काल

गुप्तकाल के पतन के पश्चात् 7 वीं सदी तक आते-आते पाटलिपुत्र की जगह कन्नौज (उत्तर प्रदेश) उत्तरी भारत का राजनीतिक केन्द्र बन गया।

484 ई. में तोरमाण और मिहिरकुल के नेतृत्व में उत्तर-पश्चिमी चीन के श्वेत हुणों ने मथुरा, कन्नौज और कौशाम्बी नगरों को जला दिया था। 

कन्नौज के मौखरिवंशीय शासक ईसानवर्मा ने हूणों को पराजित कर उत्तर भारत को हूणों से मुक्त कराया।

पुष्यभूति वंश या वर्धन वंश भारत में गुप्त वंश के पतन के पश्चात् पुष्यभूति वंश के शासकों ने विशाल साम्राज्य स्थापित किया।

पुष्यभूति वंश का संस्थापक पुष्यभूति था। इसकी राजधानी थानेश्वर (वर्तमान हरियाणा राज्य के कुरूक्षेत्र जनपद में स्थित थानेसर नामक स्थान) थी।

कन्नौज के मौखरि राजा ग्रहवर्मा के साथ हुआ।

मालवा के शासक देवगुप्त ने ग्रहवर्मा की हत्या कर दी और राज्यश्री को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया।

राज्यवर्द्धन ने देवगुप्त को मार डाला, परन्तु देवगुप्त के मित्र गौड़ नरेश शशांक ने धोखा देकर राज्यवर्द्धन की हत्या कर दी।

राज्यवर्द्धन की मृत्यु के पश्चात् 606 ई. में 16 वर्ष की अवस्था में हर्षवर्द्धन थानेश्वर की गद्दी पर बैठा।

हर्षवर्द्धन ने शशांक को पराजित करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया तथा थानेश्वर की जगह कन्नौज को जीतकर अपनी राजधानी बनाया।

हर्षवर्द्धन का साम्राज्य थानेश्वर से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तट पूर्व में गंजाम से लेकर पश्चिम में वल्लभी तक विस्तृत था।

हर्ष काल में कन्नौज को उसकी समृद्धि के कारण 'महोदय श्री' कहा जाता था।

हर्षकालीन शासन और कन्नौज की समृद्धि का उल्लेख ह्वेनसाँग के वर्णनों में मिलता है।

हर्ष द्वारा उत्तर प्रदेश में दो बौद्ध सम्मेलन क्रमशः कन्नौज और प्रयाग में आयोजित किये गये थे।

हर्षवर्द्धन के समय मथुरा सूती वस्त्रों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था।


त्रिपक्षीय संघर्ष

यशोवर्मन ने 8वीं शताब्दी के प्रारंभ में हर्षवर्द्धन की मुत्यु के पश्चात् कन्नौज पर अपना आधिपत्य जमा लिया तथा कन्नौज को एक वैभवशाली नगर बना दिया।

यशोवर्मन के पश्चात् कन्नौज पर आयुद्धवंश की सत्ता स्थापित हुई।

आठवी शताब्दी में आयुद्धवंशीय राजा इन्द्रायुद्ध के समय कन्नौज पर आधिपत्य हेतु तत्कालीन तीन बड़ी शक्तियों- पाल, गुर्जर प्रतिहार एवं राष्ट्रकूटों के मध्य त्रिपक्षीय संघर्ष आरंभ हो गया, जिसे 'कन्नौज का त्रिकोणीय संघर्ष' कहा जाता है।

यह संघर्ष लगभग 200 वर्षों तक चलता रहा तथा अन्त में गुर्जर प्रतिहारों को विजय प्राप्त हुई।

गुर्जर प्रतिहार वंश में मिहिरभोज, महिपाल, महेन्द्रपाल आदि प्रसिद्ध शासक हुए। इनमें मिहिरभोज सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रतापी शासक हुआ।

मिहिरभोज ने अपनी राजधानी कन्नौज में बनाई।

मिहिरभोज वैष्णव धर्मानुयायी था। उसने विष्णु सम्मान में ‘आदि वराह' की उपाधि ग्रहण की थी।


प्रतिहारों के बाद की स्थिति

प्रतिहारों की पराजय के पश्चात् मध्य देश (उत्तर प्रदेश) में दो नये राजपूत राजवंशों क्रमशः चन्देल वंश तथा गहड़वाल वंश का उदय हुआ।


चन्देल वंश

प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद बुन्देलखण्ड की भूमि पर चन्देल वंश का स्वतंत्र राजनीतिक इतिहास प्रारंभ हुआ।

बुन्देलखंड का प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति है।

चन्देल वंश का संस्थापक नन्नुक (831 ई.) था। जिसकी राजधानी खजुराहो थी। प्रारंभ में इसकी राजधानी कालिंजर (महोबा) थी।

राजा धंग ने अपनी राजधानी कालिंजर से दि खजुराहो स्थानान्तरित की थी।

चंदेल वंश ने कन्नौज पर आक्रमण कर लो प्रतिहार राजा देवपाल को हराया तथा उससे किया था।

एक विष्णु की प्रतिमा प्राप्त की, जिसे उसने खजुराहो के विष्णु मंदिर में स्थापित किया।

चंदेल शासक विद्याधर ने कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल की हत्या कर दी, क्योंकि किए बिना ही आत्मसमर्पण कर दिया था।

वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश, सै यद वंश तथा उसने महमूद गजनवी के आक्रमण का सामना विद्याधर ही अकेला ऐसा भारतीय नरेश था जिसने महमूद गज़नवी की महत्वाकांक्षाओं का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया।

चंदेल शासक कीर्तिवर्मन ने महोबा के समीप 'कीर्तिसागर' नामक जलाशय का निर्माण आल्हा-उदल नामक दो सेनानायक परमार्दिदेव के दरबार में रहते थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध करते हुए अपनी जान गँवाई थी।


गहड़वाल (राठौर) राजवंश

गहड़वाल वंश का संस्थापक चन्द्रदेव था। इसकी राजधानी वाराणसी (काशी) थी।

इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा गोविन्दचन्द्र था। इसका मंत्री लक्ष्मीधर शास्त्रों का प्रकाण्ड पंडित था, जिसने ‘कृत्यकल्पतरु' नामक ग्रंथ लिखा था।

गोविन्दचंद्र की एक रानी कुमारदेवी ने सारनाथ में धर्म चक्र-जिन विहार बनवाया।

पृथ्वीराज-III ने स्वयंवर से जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर लिया था।

गहड़वाल वंश का अंतिम शासक जयचन्द्र था, जिसे मुहम्मद गोरी ने 1194 ई. के चन्दावर (इटावा) युद्ध में मार डाला।


मध्यकालीन इतिहास

दिल्ली सल्तनतः दिल्ली सल्तनत के अन्तर्गत गुलाम लोदी वंश आते है

गुलाम वंश की स्थापना 1206 ई. में मोहम्मद  गोरी के गुलाम एंव सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने की थी।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपना राज्याभिषेक दिल्ली के सिंहासन पर 24 जून, 1206 ई. में कराया था।

कुतबुद्दीन ऐबक का उत्तराधिकारी आरामशाह हुआ, जिसने सिर्फ 8 महीनों तक शासन किया।

आरामशाह की हत्या करके इल्तुतमिश 1211 ई. में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इल्तुतमिश तुर्किस्तान का इल्बारी तुर्क था, जो ऐबक का गुलाम एंव दामाद था।

सुल्तान बनने के पूर्व इल्तुतमिश बदायूँ का इक्तेदार (गवर्नर) था।

लगभग प्रारंभ से ही वर्तमान उत्तर प्रदेश का क्षेत्र दिल्ली सल्तनत साम्राज्य का अंग रहा।

हालाँकि उत्तर प्रदेश में प्रमुख जागीरदारों को सम्भल, कड़ा और बदायूँ सौंप दिए गए थे, तथापि पूरा मध्य देश (उत्तर प्रदेश) प्रायः दिल्ली के सुल्तानों का विरोध करता रहा।

इस सिलसिले में कटेहर, काम्पिल्य, भोजपुर और पटियाली के नाम उल्लेखनीय है।

तुगलक वंश के सुल्तान फिरोज तुगलक ने उत्तर प्रदेश में दो नए नगरों फिरोजाबाद एंव जौनपुर का निर्माण कराया।


जौनपुर

फिरोजशाह तुगलक ने अपने भाई जौना खाँ की स्मृति में जौनपुर की स्थापना की थी।

तैमूरलंग के आक्रमण (1398 ई.) के पश्चात् तुगलक वंश का शासन समाप्त हो गया।

1394 ई. में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर में शर्की साम्राज्य की स्थापना फिरोज तुगलक प्रमुख अमीर तथा नासिरुद्दीन तुगलक के विद्रोही सूबेदार मलिक सरवर (ख्वाजाजहाँ) ने की थी।

शर्की शासकों ने दिल्ली की बादशाहत का जमकर प्रतिरोध किया और कन्नौज तथा अन्य सीमांत जिलों पर दिल्ली का प्रभुत्व नहीं माना।

शासक इब्राहिमशाह के समय जौनपुर शिक्षा, संस्कृति, स्थापत्य, कला एंव व्यापार का प्रमुख केन्द्र बन गया । फलतः इसे 'शिराज-ए-हिन्द' तथा 'पूर्व का शिराज' नाम से पुकारा जाने लगा।

दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने जौनपुर को जीत लिया तथा शर्की साम्राज्य को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।

जौनपुर के अन्य प्रमुख शासक थे- मुबारकशाह (1399-1402 ई.), शम्सुद्दीन इब्राहिमशाह (1402-1436 ई.) महमूद शाह (1436-1451 ई.) और हुसैनशाह (1458-1500 ई.)।

1408 ई. में अटालादेवी मस्जिद का निर्माण शर्की सुल्तान इब्राहिम द्वारा किया गया था।

1430 ई. में झंझरी मस्जिद का निर्माण इब्राहिम शर्की के द्वारा एंव लाल दरवाजा मस्जिद का निर्माण मुहम्मदशाह के द्वारा 1450 ई. में किया गया था।

1470 ई. में जामी मस्जिद का निर्माण हुसैनशाह शर्की के द्वारा किया गया था।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली के पूर्ववर्ती सुल्तान तुर्क थे, लेकिन लोदी सुल्तान अफगान थे।

लोदी सुल्तान सिकन्दर लोदी ने 1506 ई. में आगरा शहर की नींव डाली तथा इसे अपनी उप-राजधानी बनाया।

21 अप्रैल, 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी बाबर से हार गया। इस युद्ध में वह मारा गया।


भक्ति आन्दोलन

भक्ति आन्दोलन की शुरुआत 6वीं शताब्दी तमिल क्षेत्र में हुई, जो कर्नाटक और महाराष्ट्र में फैल गया।

भक्ति आन्दोलन का विकास 12 अलवार वैष्णव संतों और 63 नयनार शैव संतों ने किया।

रामानंद के द्वारा भक्ति आंदोलन को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लाया गया।

रामानंद की शिक्षा से दो संप्रदायों क्रमशः।सगुण और निर्गुण का प्रादुर्भाव हुआ।

सगुण संप्रदाय के सर्वाधिक प्रसिद्ध विद्वानों में तुलसीदास, निम्बार्क, वल्लभाचार्य, चैतन्य, सूरदास और मीराबाई आदि शामिल थे।

निर्गुण सम्प्रदाय के सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतिनिधि कबीर थे। जिन्हें 'भावी उत्तर भारतीय पंथों: का आध्यात्मिक गुरु" माना गया।


उत्तर प्रदेश में : भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्त 

रामानंद : रामानंद का जन्म सन् 1299 में प्रयाग में हुआ था।

इन्होनें अपना सम्प्रदाय सभी जातियों के लिए खोल दिया। इन्होनें भक्ति को मोक्ष का एकमात्र साधन स्वीकार किया।

इन्होनें मर्यादा फरुषोत्तम राम एंव सीता की अराधना को समाज के समक्ष रखा। इनके प्रमुख शिष्य थे- रैदास (हरिदास), कबीर (जुलाहा), धन्ना (जाट), सेना (नाई) एंव पीपा (राजपूत)।


कबीरः कबीर का जन्म वाराणसी (काशी) में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था।

इन्होनें भगवान, अल्लाह आदि को एक ही ईश्वर के अनेक रूप माने।

इन्होनें जाति-प्रथा, धार्मिक कर्मकाण्ड, बाह्य आडम्बर, मूर्तिपूजा, जप-तप, अवतारवाद आदि का घोर विरोध करते हुए एकेश्वरवाद आस्था व्यक्त की एंव निराकार ब्रह्म की उपासना को महत्व दिया।

कबीर के उपदेश 'सबद' सिक्खों के आदि कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' (शिष्य कबीर सुल्तान सिकन्दर लोदी के समकालीन धर्मदास द्वारा संकलित) नाम से प्रसिद्ध है ग्रंथ में संग्रहीत है।


गोस्वामी तुलसीदास : इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जनपद में अवस्थित राजापुर गाँव में सन् 1532 में हुआ था।

इन्होनें रामचरितमानस' की रचना की। इनकी मृत्यु 1632 ई. में हुई थी।

तुलसीदास मुगल शासक अकबर एंव मेवाड़ के शासक राणाप्रताप के समकालीन थे।


धन्नाः धन्ना का जन्म 1415 ई. में एक जाट परिवार में हुआ था। राजपूताना से बनारस आकर ये रामानन्द के शिष्य बन

गए। कहा जाता है कि इन्होंने भगवान की मूर्ति को हठात् भोजन कराया था।


रैदासः रैदास चमार जाति के थे और बनारस (वाराणसी)के रहने वाले थे।

इन्होनें ‘रायदासी सम्प्रदाय' की स्थापना की।


मुगल साम्राज्य


बाबर (1526-1530 ई.)

बाबर को अपने प्रारंभिक दिनों में ही गंगाघाटी, सम्भल, गाजीपुर, काल्पी, इटावा और कन्नौज के अफगानों की ओर से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर ने पहली बार 'तुगलमा युद्ध नीति' एंव तोपखाने का प्रयोग किया था। उस्ताद अली एंव मुस्तफा बाबर के दो प्रसिद्ध निशानेबाज थे, जिन्होने पानीपत के प्रथम युद्ध में भाग लिया था।

खानवा के युद्ध में राणा साँगा को पराजित कर बाबर ने अवध एंव कन्नौज पर अधिकार कर लिया।  शेरशाह ने चुनार की विधवा मल्लिका से विवाह करके चुनार को प्राप्त किया था।

खानवा युद्ध के विजय के बाद बाबर ने 'गाजी' की उपाधि धारण की थी।

26 दिसम्बर, 1530 ई. को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई।

प्रारंभ में बाबर के शव को आगरा के आरामबाग में दफनाया गया। बाद में काबुल में उसके द्वारा चुने गए स्थान पर दफनाया गया।


हुमायूँ (1580-1556 ई.)

29 दिसंबर, 1530 को नसीरुद्दीन हुमायूँ आगरा में 23 वर्ष की अवस्था में सिंहासन पर बैठा।

1533 ई. में हुमायूँ ने दीनपनाह नामक नए नगर की स्थापना की थी।

25 जून, 1539 में चौसा का युद्ध शेर खाँ एंव हुमायूँ के बीच हुआ। इस युद्ध में शेर खाँ विजयी रहा। इसी युद्ध के बाद शेर खाँ ने शेरशाह की पदवी ग्रहण कर ली।

17 मई 1540 में बिलग्राम या कन्नौज युद्ध शेर खाँ एंव हुमायूँ के बीच हुआ। इस युद्ध में हुमायूँ पराजित हुआ। शेर खाँ ने आसानी से आगरा एंव दिल्ली पर कब्जा कर लिया।

1555 ई. में हुमायूँ पंजाब के शूरी शासक सिकन्दर को पराजित कर फनः दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

1 जनवरी, 1956 को दीन पनाह भवन में स्थित पुस्तकालय (शेर मंडल) की सीढ़ियों से गिरने के कारण हुमायूँ की मृत्यु हो गई।

'हुमायूँनामा' की रचना गुल-बदन बेगम ने की थी।


शेरशाह (1540-1545)

अफगान वंशीय शेरशाह सूरी सूर साम्राज्य का संस्थापक था। शेरशाह-बिलग्राम या कन्नौज युद्ध (1540 ई.) के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

शेरशाह की मृत्यु कालिंजर के किले को जीतने के क्रम में 22 मई, 1545 को हो गई। मृत्यु के समय वह उक्का (एक प्रकार का तोप) नाम का अग्नेयास्त्र चला रहा था,

जिसका गोला फट जाने से उसकी मृत्यु हुई। शेरशाह का मकबरा सासाराम में झील के बीच उफंचे टीले पर नर्मित किया गया है।

शेरशाह ने कुल चार सड़कें बनवायी- 1. सोनार गाँव (बंगाल से लाहौर तक, जी.टी. रोड), 2. आगरा से बपुरहानपुर तक 3. आगरा से चित्तौड़ तक तथा 4. लाहौर से मुल्तान तक।

मलिक मुहम्मद जायसी शेरशाह के समकालीन थे।

शेरशाह ने भूमि की माप के लिए 32 अंक वाला सिकन्दरी गज एंव सन की डंडी का प्रयोग किया।


अकबर (1556-1605 ई.)

15 अक्टूबर, 1542 को सम्राट अकबर का जन्म हमीदा बानू बेगम के गर्भ मे अमरकोट के राणा वीरसाल के महल में हुआ था।

पंजाब के कलानौर नामक स्थान पर अकबर का राज्याभिषेक 14 जनवरी, 1556 को हुआ। 

पानीपत की दूसरी लड़ाई 5 नवम्बर, 1556 को अकबर और हेमू के बीच हुई थी।

अकबर के दरबार का प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन तथा प्रसिद्ध चित्रकार अब्दपुर समद था। इनके अलावा दसवंत एंव बसावन भी दरबारी चित्रकार थे।

अकबर के शासनकाल के प्रमुख गायक तानसेन, बाज बहादपुर, बाबा रामदास एंव बैजू बाबरा थे। अकबर के काल में स्वामी हरिदास एक महान संगीतज्ञ थे।

ये वृंदावन (उत्तर प्रदेश) में रहकर भगवान की उपासना करते थे।

प्रचलित मान्यता के अनुसार हरिदास का गाना सुनने के लिए अकबर को इनकी कुटिया पर जाना पड़ा क्योंकि इन्होंने अकबर के दरबार में जाने से मना कर दिया था।

अकबर के समकालीन प्रसिद्ध सूफी सन्त शेख सलीम चिश्ती फतेहपुर सीकरी थे।

अकबर के नवरत्नों में शामिल दो प्रसिद्ध मंत्री टोडरमल (सीतापुर) और बीरबल (काल्पी) उत्तर प्रदेश के थे।

टोडरमल 1562 ई. में ये अकबर की सेवा में आए।

'दीवान-ए-अशफ' के पद पर कार्य करते हुए इन्होने भूमि सुधार का महत्वपूर्ण कार्य किया।

1580 ई. में इन्होनें 'दशहाल बंदोबस्त' व्यवस्था लागू की।

बीरबल अकबर के नवरत्नों में सर्वाधिक प्रसिद्ध था।

इनका जन्म उत्तर प्रदेश में काल्पी नामक स्थान पर हुआ था।

बीरबल 'दीन-ए-इलाही' धर्म स्वीकार करने वाला पहला और अंतिम हिन्दू शासक था।

1586 ई. में यूसुफजाइयों के विद्रोह को दबाने के दौरान बीरबल की हत्या हो गयी।

प्रयाग शहर का नाम 'प्रयागराज' अकबर द्वारा 1538 ई. में रखा गया। हिन्दी नाम प्रयागराज का अर्थ अरबी शब्द 'इलाह' (अकबर द्वारा लाये गये धर्म दीन-ए-इलाही के संदर्भ से) एंव फारसी से 'आबाद' (अर्थात् बसाया हुआ)- यानि 'ईश्वर द्वारा बसाया, गया' या 'ईश्वर का शहर' है। अकबर की मुत्यु 16 अक्टूबर, 1605 को हुई। इसे आगरा के निकट सिकन्दरा में दफनाया गया।


जहाँगीर (1608-16271)

अकबर का उत्तराधिकारी जहाँगीर 24 अक्टूबर, 1605 को नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाही गाजी' की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा।

अकबर ने सूफी संत 'शेख सलीम चिश्ती' के नाम पर अपने पुत्र का नाम 'सलीम' रखा था।

जहाँगीर को न्याय की जंजीर' के लिए याद किया जाता है। यह जंजीर सोने की बनी थी, जो आगरा के किले के शाहबुर्ज एंव यमुना तट पर स्थित पत्थर के खंभे में लगवाई हुई थी।

जहाँगीर के शासनकाल में मुगल चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर थी। यही कारण है कि जहाँगीर के समय को 'चित्रकला का स्वर्णकाल' भी कहा जाता है।

जहाँगीर ने आगा रजा के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रणशाला की स्थापना की। उल्लेखनीय है कि 'हमजा नामा' का विषय चित्रकला है।

जहाँगीर के दरबार के प्रमुख चित्रकार : आगा रजा, अबुल हसन, मुहम्मद नासिर, मुहम्मद मुराद, उस्ताद मंसूर, विशनदास, मनोहर एंव गोवर्धन, फारुख बेग, दौलत। 

अशीक के कौशाम्बी स्तंभ (वर्तमान में प्रयाग) पर समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति तथा जहाँगीर का लेख उत्कीर्ण है।


शाहजहाँ (1627-16675)

शाहजहाँ (खुर्रम) का जन्म 5 फ़रवरी, 1592 को जोधपुर के शासक मोटा राजा उदय सिंह की पुत्री जगत गोसाई के गर्भ से लाहौर में हुआ था।

1638 ई. में शाहजहाँ ने अपनी राजधानी को आगरा से लाने के लिए यमुना

नदी के दाहिने तट पर शाहजहाँनाबाद की नींव डाली।

अपनी बेगम मुमताज महल की याद में शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण आगरा में उसकी कब्र के उफपर करवाया।

उल्लेखनीय है कि हुमायूँ के मकबरे को ताजमहल का पूर्ववर्ती माना जाता है।

ताजमहल की रूपरेखा उस्ताद ईशा ने तैयार की थी तथा इसका निर्माण करने वाले मुख्य स्थापत्य कलाकार उस्ताद अहमद लाहौरी था।

मयूर सिंहासन का निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था।

शाहजहाँ के शासनकाल को 'स्थापत्य का स्वर्णयुग' कहा जाता है।

8 जून, 1658 को औरंगजेब ने शाहजहाँ को बंदी बना लिया। आगरा के किले में अपने कैदी जीवन के आठवें वर्ष 22 जनवरी, 1666 को 74 वर्ष की अवस्था में शाहजहाँ की मृत्यु हो गई।


औरंगजेब (1658-1707 ई.)

24 अक्टूबर, 1618 को दोहाद (गुजरात) नामक स्थान पर औरंगजेब का जन्म हुआ।

देवराई के युद्ध में सफल होने के पश्चात् 15 मई, 1659 को औरंगजेब ने दिल्ली में प्रवेश किया और शाहजहाँ के शानदार महल में जून, 1659 को दूसरी बार अपना राज्याभिषेक औरंगजेब सर्वाधिक हिन्दू अधिकारियों को नियुक्त करने वाला मुगल सम्राट था। औरंगजेब ने 'कुरान' को अपने शासन का आधार बनाया।

भारतीय शास्त्रीय संगीत पर फारसी में सर्वाधिक पुस्तकें औरंगजेब के शासनकाल में लिखी गयी।

1665 ई. में औरंगजेब ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया। इसके शासनकाल में तोड़ें गए मंदिरों में सोमनाथ का मंदिर, बनारस का विश्वनाथ मंदिर तथा वीर सिंह देव द्वारा जहाँगीर काल में मथुरा में निर्मित केशव राय मंदिर थे।

20 फरवरी, 1707 को औरंगजेब की मृत्यु हो गयी। इसे खुलदाबाद जो अब रोजा कहलाता है, में दफनाया गया।

बुन्देलखण्ड ने औरंगजेब के शासनकाल में ही वीर छत्रसाल के नेतृत्व में विद्रोह का बिगुल बजा दिया।

छत्रसाल को पेशवा बाजीराव की सहायता स्वीकार करनी पड़ी और इस प्रकार उत्तर प्रदेश में मराठों के पैर जमे।

वर्ष 1732 में अवध का स्थानीय सूबेदार सआदत खाँ स्वतंत्र हो गया।

1757 ई. तक वर्तमान उत्तर प्रदेश में 5 स्वतंत्र राज्य क्रमशः मेरठ तथा बरेली के उत्तर में नाजिब खान पठान सरकार, मेरठ तथा दोआब क्षेत्र में रूहेलों के अन्तर्गत रूहेलखण्ड, फर्रुखाबाद के नवाब के अन्तर्गत मध्य दोआब क्षेत्र, वर्तमान अवध तथा पूर्वी जनपदों पर अवध के नवाब तथा बुन्देलखण्ड पर पर मराठों का शासन स्थापित था।


अवध के नवाब

अवध मुगल साम्राज्य का एक सूबा था, जिसमें वर्तमान उत्तर प्रदेश का काफी हिस्सा तथा बिहार के भाग आते थे।

वर्ष 1732 में सआदत खाँ बुरहान-उल-मुल्क अवध का नवाब बना। इसी वर्ष मुगल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर सआदत खाँ बुरहान-उल-मुल्क ने एक स्वायत्त राज्य के रूप में अवध की स्थापना की।

सन् 1739 में नादिरशाह के विरुद्ध लड़ाई में दिल्ली में सआदत खाँ को बंदी बना लिया गया तथा उसने आत्महत्या कर ली।

1739 ई. सआदत खाँ का दामाद तथा भतीजा सफदरजंग अवध का नवाब बना।

1748 ई. में सफदरजंग मुगल साम्राज्य का वजीर बनाया गया तथा प्रयागराज का प्रान्त उसे सौंप दिया गया। सफदरजंग के उत्तराधिकारी नवाब वजीर कहलाने लगे।

सन् 1754 में शुजाउद्दौला अवध का नवाब वजीर बना।

शुजाउद्दौला ने मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय के साथ 1764 ई. में हुए बक्सर के युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध युद्ध किया ।

1773 ई. में शुजाउद्दौला और वारेन हेस्टिंग के बीच 'बनारस की संधि' हुई।

'बनारस की संधि' के तहत् शुजाउद्दौला ने इलाहबाद एंव कड़ा खरीदा तथा ब्रिटिश सेना को अवध में रहने सहमति प्रदान की।

1774 ई. में शुजाउद्दौला ने अंग्रेजों की मदद से रुहेलखंड को अवध में मिला लिया।

आसफुद्दौला ने 1775 ई में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ 'फैजाबाद की संधि' की। इस संधि के तहत उसने कम्पनी के ऋण को बढ़ा लिया।

आसफुद्दौला ने अवध की राजधानी फैजाबाद से स्थानांतरित कर लखनऊ में स्थापित की।

वाजिद अली शाह अवध का अंतिम नवाब वजीर था। 1856 ई. में लार्ड डलहौजी ने अवध को ब्रिटिश राज्य में मिला लिया तथा वाजिद अली शाह को पेंशन देकर कोलकाता निर्वासित कर दिया।


उत्तर प्रदेश का आधुनिक इतिहास


1707 में औरंगजेब की मृत्यु के उपरान्त 50 वर्षों में कुल 8 मुगल शासक दिल्ली की गही पर बैठे।

1761 ई. के तीसरे पानीपत के युद्ध, जो मराठा एंव अहमदशाह अब्दाली की सेना के बीच हुआ, इस युद्ध में मराठों, जाटों तथा राजपूतों की पराजय ने तथा बक्सर के युद्ध (1764 ई.) में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा बंगाल के नवाब मीर कासिम की पराजय ने, उत्तर भारत का भाग्य निर्धारित कर दिया।

अंग्रेजों ने रुहेलखंड में मराठों को 1773 ई. में पराजित कर दिया तथा उन्हें दोआब से निष्कासित कर दिया।

अंग्रेजी सेनाओं ने रुहेल सरदार रहमत खान को 1774 ई. में शाहजहाँपुर में पराजित कर रुहेलखंड को अवध के नवाब को सौंप दिया।

1803 ई. में लॉड लेक ने मराठों को पराजित कर अलीगढ़, दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर लिया।

बहादुरशाह द्वितीय अंतिम मुगल सम्राट था। गोरखा युद्ध (1816) में अंग्रेजों को कुमायूँ तथा देहरादून भी प्राप्त हो गए। इस समय तक सारा क्षेत्र 'बंगाल प्रेसीडेन्सी' का हिस्सा रहा तथा इस पर गवर्नर जनरल का शासन चलता रहा। इसे बंगाल प्रेसीडेन्सी से अलग कर सन् 1883 में 'आगरा प्रेसीडेन्सी' का नाम दिया गया तथा अलग जनरल की नियुक्ति भी कर दी गई।

1836 ई. में उत्तर प्रदेश का नाम 'उत्तर-पश्चिमी एक गवर्नर प्रान्त' कर दिया गया। इस समय इसके अन्तर्गत आगरा, झाँसी, जालौन के साथ-साथ दिल्ली तथा अजमेर के क्षेत्र थे। आगे चलकर इसमें मारवाड़ा, बुन्देलखण्ड तथा हमीरपुर भी शामिल हो गए तथा 1856 ई. में अवध को भी इसमें शामिल कर लिया गया।

1857 ई. की महान क्रान्ति की शुरूआत उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर से हुई।

इस आन्दोलन के पीछे तत्कालीन कारण कारतूसों में सूअर और गाय की चर्बी का होना था। लेकिन आन्दोलन की व्यापकता को देखते हुए यह प्रमाणित होता है कि इसका मूल कारण अंग्रेजों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक नीतियाँ थी।

29 मार्च, 1857 को मंगल पांडे (उत्तर प्रदेश, बलिया जनपद के निवासी) नामक एक सैनिक ने कोलकाता के निकट बैरकपुर में गाय की चर्बी मिले कारतूसों को मुँह से काटने से स्पष्ट मना कर दिया था, फलस्वरूप उसे गिरफ्तार कर 8 अप्रैल, 1857 को फाँसी दे दी गई।

मेरठ की तीसरी देशी घुड़सवार सेना के चर्बीयुक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर देने से अंग्रजों ने 90 में से 85 सैनिकों की 9 मई, 1857 को वर्दी उतरवाकर जंजीरों में जकड़ कैद कर लिया गया।

उल्लेखनीय है कि 1857 ई. की महान क्रान्ति के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग एंव इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री पार्मस्टेन थे।

'1857 ई. की महान क्रान्ति' की शुरूआत 10 मई, 1857 के दिन मेरठ की पैदल टुकड़ी 20 N.I. से हुई।

इन सैनिकों ने 11 मई 1857 को दिल्ली पर कब्जा कर लिया गया तथा 12 मई, 1857 को अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह द्वितीय को सम्राट घोषित कर दिया।

दिल्ली का प्रशासन 'जलसा' (4 नागरिक, 6 सैनिक) नामक समिति ने संभाला।

5 जून, 1857 को नाना साहब को कानपुर का पेशवा, घोषित किया गया तथा अवध की बेगम हजरत महल ने अपने पुत्र बिरजिश कादर को अवध का नवाब बना दिया।

कानपुर में 1857 ई. के विद्रोह में शहीद हुई अजीजन बेगम नाचने-गाने के पेशे से संबद्ध थी।

दिल्ली में जनरल बख्त खाँ के नेतृत्व में भारतीय सिपाहियों और जॉन निकल्सन के नेतृत्व में जून, 1857 में अंग्रेज सैनिकों के बीच युद्ध हुआ और अंग्रेजों द्वारा दिल्ली पर कब्जा कर लिया गया तथा बहादुरशाह द्वितीय को बंदी बनाकर रंगून भेज दिया गया।

तात्याँ टोपे के नेतृत्व में ग्वालियर रेजिमेंट ने 6 नवम्बर, 1857 को कानपुर पर कब्जा किया।

दिसम्बर, 1857 में सर कोलीन कैम्पबेल ने कानपुर पर पुनः कब्जा कर लिया। लखनऊ में विद्रोही सैनिकों का नेतृत्व अवध की महारानी बेगम हजरत महल ने किया तथा ब्रिटिश रेजीडेन्सी पर कब्जा कर लिया।

कैम्पबेल ने लखनऊ पर 21 मार्च, 1858 को पुनः कब्जा कर लिया तथा बेगम हजरत महल नेपाल पलायन कर गई।

झाँसी पर 4 अप्रैल, 1858 को सर ह्यूरोज ने कब्जा कर लिया।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई अंग्रजों के चंगुल से भाग गई तथा उन्होंने तात्या टोपे के साथ मिलकर ग्वालियर पर कब्जा किया। तात्या टोपे (मूल नाम रामचन्द्र) ने अपनी छापामार रणनीति से अंग्रेजों को भयभीत कर दिया था।

17 जून, 1858 को रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो गई।

सर कोलीन कैम्पबेल ने 5 मई, 1858 को बरेली पर कब्जा कर लिया।

कैप्टन नील द्वारा जून, 1858 में बनारस और प्रयागराज पर कब्जा कर लिया गया।


1857 ई. की क्रान्ति के बाद उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक परिवर्तन

1857 ई. की महान क्रान्ति के पश्चात् 'ब्रिटिश क्राउन' ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत पर शासन का अधिकार अपने हाथ में ले लिया।

1 नवम्बर, 1858 को प्रयागराज में आयोजित दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने इंग्लैण्ड की महारानी की उद्घोषणा पढ़ी।

अब भारत का शासन क्राउन के अधीन एक भारत मंत्री (सचिव) तथा 15 सदस्यीय काउंसिल द्वारा किए जाने का प्रावधान किया गया।

गवर्नर जनरल को अब वायसराय की उपाधि दे दी गई।

उल्लेखनीय है कि लार्ड कैनिंग (1856-1862) भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा नियुक्त अंतिम गवर्नर-जनरल तथा ब्रिटिश सम्राट के अधीन नियुक्त भारत का प्रथम वायसराय था।

1858 ई. में दिल्ली डिवीजन को उत्तर-पश्चिमी प्रदेश से अलग कर दिया गया और उत्तर-पश्चिमी प्रदेश (उत्तर प्रदेश) की राजधानी आगरा से प्रयागराज स्थानांतरित कर दी गई।


उत्तर प्रदेश में राष्ट्रवाद का विकास

1857 ई. की महान क्रान्ति के पश्चात् उत्तर प्रदेश में अनेक धार्मिक एंव सामाजिक सुधार आन्दोलन तथा शिक्षा एंव समाचार धार्मिक तथा सामाजिक सुधार आन्दोलन पत्र-पत्रिकाओं के प्रचार-प्रसार ने प्रदेश में राष्ट्रवाद के विकास में महती भूमिका निभाई।

शिवदयाल साहब ने 1861 ई. में आगरा में 'राधास्वामी सतसंग' की स्थापना की।

सर सैयद अहमद खाँ 1864 ई. में 'साइंटिफिक सोसाइटी' एंव 1875 ई. में अलीगढ़ मुस्लिम-ऐंग्लों ओरियंटल कॉलेज' (वर्तमान नाम- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) की स्थापना की तथा इसके माध्यम से मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा के प्रसार में अहम भूमिका निभाई।

1867 ई. में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने वाराणसी से 'कवि वचन सुधा' तथा 1872 ई. में 'हरिश्चन्द्र मैगनीज' का प्रकाशन किया।

देवबंद (उत्तरप्रदेश) में मुहम्मद कासिम ननौतवी तथा रसीद अहमद गंगोही ने 1867 ई. में इस्लामी मदरसे की स्थापना की तथा अंग्रेजों के खिलाफ 'जिहाद' के उद्देश्य से दारूल-उलूम' या 'देवबंद आन्दोलन' की शुरूआत की। देवबन्द आन्दोलन ने सर सैयद अहमद खाँ के 'अलीगढ़ आन्दोलन' का विरोध किया क्योंकि उन्हें सर सैयद अहमद खाँ से अंग्रेजों के प्रति निष्ठा के कारण घृणा थी।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 ई. मुम्बई में 'आर्य समाज' की स्थापना की। उन्होंने के साथ-साथ शिक्षा के प्रसार में भी अहम भूमिका निभाई।

बालकृष्ण भट्ट ने 1877 ई. में 'हिन्दी प्रदीप' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। 

बनारस में एनी बेसेन्ट ने 1898 ई. में 'सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज' की स्थापना की, जो 1916 ई. में मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' बना।

हरिद्वार में 'गुरुकुल कांगड़ी' की स्थापना स्वामी श्रद्धानंद तथा मुंशीराम लेखराम ने की।


भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन 28 दिसंबर, 1885 को बम्बई में 'गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज' के भवन में एक अंग्रेज सिविल सर्वेट ‘एलन आक्टोवियन ह्यूम' (ए. ओ. ह्यूम) ने किया।

व्योमेश चन्द्र बनर्जी 'भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस' के प्रथम अध्यक्ष हुए।

'भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस' के प्रथम अधिवेशन में कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिनमें 14 प्रतिनिधि उत्तर प्रदेश के थे।

1886 ई. में दादा नौरोजी की अध्यक्षता में कोलकाता में हुए 'भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस' के दूसरे अधिवेशन में कुल 431 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिनमें 74 प्रतिनिधि उत्तर प्रदेश के थे।

उत्तर प्रदेश में वर्ष 1947 तक भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के कुल 8 अधिवेशन हुए जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है- 1888, 1892 व 1910 में इलाहाबाद में; 1899, 1916 व 1936 में लखनउ में, 1905 में वाराणसी में, 1925 में कानपुर में तथा 1964 में मेरठ में।


किसान आन्दोलन

उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम होमरूल लीग के कार्यकर्ताओं द्वारा अवध क्षेत्र में किसानों को जमींदारों और ताल्लुकदारों के शोषण के विरुद्ध संगठित करने का प्रयास किया।

गौरीशंकर मिश्र, इन्द्रनारायण द्विवेदी तथा मदन मोहन मालवीय जी के प्रयासों से 1918 ई. में 'उत्तर प्रदेश किसान सभा' का गठन किया गया।

बाबा रामचन्द्र, झिंगरीपाल सिंह तथा दुर्गापाल सिंह ने 'उत्तर प्रदेश किसान सभा को संगठित तथा शक्तिशाली बनाने में महती भूमिका अदा की।

बाबा रामचन्द्र महाराष्ट्र के ब्राह्मण थे तथा उन्होने 'रामचरित मानस' का पाठ कर कृषकों में गौरव की भावन जागृत की।

17 अक्टूबर, 1920 को बाबा रामचन्द्र ने प्रतापगढ़ में 'अवध किसान सभा' का गठन किया, जिसमें, गौरीशंकर मिश्र, पंडित जवाहर लाल नेहरू, माताबदल पांडे, देवनारायण पांडे तथा केदार पांडे की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

दिसंबर, 1920 को 'अवध किसान सभा' की अयोध्या में एक विशाल रैली हुई।

उत्तर प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र हरदोई, बहराइच, सुल्तानपुर तथा सीतापुर में मादरी पासी नामक किसान ने 'एक आन्दोलन' चलाया। यह आन्दोलन लगान वृद्धि के विरुद्ध था।

नाई-धोबी बंद आन्दोलन प्रतापगढ़ जनपद में जमींदारों तथा ताल्लुकदारों का सामाजिक बहिष्कार हेतु चलाया गया।

1936 ई. में प्रो. एन. जी. रंगा, इन्दु लाल याज्ञनिक तथा स्वामी सहजानंद सरस्वती के प्रयासों से लखनऊ में 'अखिल भारतीय किसान आन्दोलन' का आयोजन किया गया।

उत्तर प्रदेश में द्वितीय किसान आन्दोलन का नेतृत्व जवाहर लाल नेहरू ने किया था। इन्होनें प्रयागराज में कर बंदी आन्दोलन' का नेतृत्व किया जिसके मुख्य नेता जय प्रकाश नारायण एंव लाल बहादपुर शास्त्री थे।


खिलाफत आन्दोलन

भारतीय मुसलमानों द्वारा मित्र राष्टों के विरुद्ध विशेषकर ब्रिटेन के खिलाफ टर्की के खलीफा के समर्थन में खिलाफत आन्दोलन चलाया गया।

समूचे देश में 19 अक्टूबर, 1919 को 'खिलाफत दिवस मनाया गया।

गाँधी जी ने हिन्दू-मुस्लिम को एक मंच पर लाने के लिए खिलाफत आन्दोलन को सहयोग देने का निर्णय लिया।

खिलाफत आन्दोलन के दौरान 20 जून,1920 को प्रयागराज में महात्मा गाँधी की अध्यक्षता में खिलाफत कमेटी की बैठक हुई, जिसमें इस आन्दोलन के प्रस्ताव को पास किया गया।

1924 ई. में तुर्की की कमालपाशा सरकार द्वारा खलीफा के पद को समाप्त करने के पश्चात् खिलाफत आन्दोलन को समाप्त कर दिया गया।


असहयोग आन्दोलन

रॉलेट एक्ट, जालियाँवाला बाग हत्याकांड के विरुद्ध महात्मा गाँधी ने 1 अगस्त, 1920 को 'असहयोग आंदोलन' प्रारंभ किया।

असहयोग आन्दोलन के दौरान उत्तर प्रदेश में अनेक विद्यालयों की स्थापना की गयी तथा विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई।

बनारस में असहयोग आन्दोलन के समय राष्ट्रीय शिक्षा के विकास हेतु 'काशी विद्यापीठ' की स्थापना की गई।

अवध प्रान्त के किसानों ने असहयोग

आन्दोलन के दौरान गैरकानूनी उगाही के विरुद्ध आन्दोलन प्रारंभ किया था।

गोरखपुर जनपद के चौरी-चौरा नामक स्थान पर असहयोग आन्दोलनकारियों ने 5 फ़रवरी, 1922 को क्रोध में आकर थाने में आग लगा दी, जिससे एक थानेदार एंव 21 सिपाहियों हो गई। इस घटना से दुखी होकर महात्मा गाँधी ने 12 फ़रवरी, 1922 का असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया।

13 मार्च, 1922 को गाँधीजी को गिरफ्तार कर 6 वर्ष की कड़ी कारावास की सजा सुनाई गई। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से गाँधीजी को 5 फ़रवरी, 1924 को रिहा कर दिया गया।

लखनऊ में नवंबर, 1928 को 'साइमन कमीशन' का बहिष्कार किया गया था।


स्वराज पार्टी

असहयोग आन्दोलन के असमय वापसी से दुःखी होकर 1923 ई. में प्रयागराज में चितरंजनदास एंव मोतीलाल नेहरू ने काँग्रेस के अन्तर्गत 'स्वराज पार्टी की स्थापना की। इसके अध्यक्ष चितरंजन दास तथा महासचिव मोतीलाल नेहरू थे।

स्वराज पार्टी में विट्ठलभाई पटेल, मदनमोहन मालवीय तथा एम.आर. जयकर भी सम्मिलित थे।

स्वराज पार्टी ने 1923 ई. के विधान परिषद् के चुनाव में भाग लिया।

चितरंजन दास की मृत्यु के बाद मालवीय जी ने मोतीलाल नेहरू से मतभेद के कारण जयकर तथा लाला लाजपत राय के साथ मिलकर 'स्वतंत्र काँग्रेस पार्टी' नाम से नई पार्टी बनाई।

सितम्बर, 1924 में कानपुर के एक पत्रकार सत्यभक्त ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी।

'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' का प्रथम सम्मेलन पेरियार की अध्यक्षता में दिसंबर, 1925 को कानपुर में हुआ था। 

'प्रताप' एंव 'प्रभु' बोल्शेविज्म का प्रचार-प्रसार वाले कानपुर से छपने वाले अखबार थे।


क्रान्तिकारी आन्दोलन

युवाओं में गाँधी जी द्वारा असहयोग आन्दोलन को वापस लिये जाने के कारण असंतोष की भावना उत्पन्न हो गयी और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों के लिए प्रेरित हुए।

इस दौरान उत्तर प्रदेश क्रान्तिकारी राष्ट्रवादियों का मुख्य केन्द्र बन गया।

कानपुर में, 1924 ई. में शचीन्द्र सान्याल ने 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की।

उत्तर प्रदेश के राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्र सान्याल आदि अन्य क्रान्तिकारी थे।

1930 ई. में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जयप्रकाश नारायण और लाल बहादुर शास्त्री के सहयोग से प्रयागराज में 'करबंदी आन्दोलन' की शुरूआत की।

‘गाँधी-इरविन पैक्ट' 4 मार्च, 1931 हुआ। इसके बाद गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया।

'गाँधी-इरविन समझौता' को 'दिल्ली-समझौता' के नाम से भी जाना जाता है।

जवाहर लाल नेहरू को दिसंबर, 1931 में गिरफ्तार कर लिया गया।

गाँधीजी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद 3 जनवरी, 1932 को पुनः सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारंभ कर दिया।


1937 का प्रान्तीय मंत्रिमंडल

1937 ई. में भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत हुए प्रान्तीय विधानसभाओं के चुनाव में संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) में काँग्रेस को कुल 228 में से 134 स्थानों पर सफलता प्राप्त हुई तथा प्रान्त में कांग्रेस की सरकार बनी।

पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त मध्य प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के प्रथम मुख्यमंत्री बने।


भारत छोड़ो आन्दोलन

काँग्रेस ने वर्धा (1942 ई.) में अंग्रेजों भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित किया।

भारत छोड़ो आन्दोलन की शुरूआत 9 अगस्त, 1942 को हुई। इसी आन्दोलन में गाँधी जी ने 'करो या मरो' का नारा दिया।

गाँधी जी एंव काँग्रेस के अन्य सभी महत्वपूर्ण नेता 9 अगस्त, 1942 को प्रातः काल ही गिरफ्तार कर लिये गये।

गाँधी जी को पूना के आगा खाँ महल में,नजवाहर लाल नेहरू को प्रयागराज के नैनी जेल में तथा काँग्रेस कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों को अहमदनगर के दुर्ग में रखा गया था।

9 मई, 1944 को गाँधी जी को जेल से छोड़ा गया।

उत्तर प्रदेश में 16 अगस्त, 1942 को बलिया जेल पर आन्दोलनकारियों ने धावा बोलकर कैदियों को छुड़ा लिया तथा सरकारी अधिकारियों को बंदी बना लिया।

काँग्रेस के स्थानीय नेता चित्तू पाण्डेय के नेतृत्व में बलिया शहर में एक अस्थाई सरकार का गठन किया गया।


उत्तर प्रदेश के स्वरूप में परिवर्तन

उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग के कई जनपद मुगल शासन के पतन के पश्चात् अवध के नवाबों के अधीन थे तथा पश्चिमी भाग के कुछ जनपद दिल्ली के नियंत्रण में थे, जबकि द.पू. एंव पूर्वी भाग के कुछ जनपद बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन थे। 

बंगाल प्रेसीडेंसी से प्रदेश के बाकी हिस्सों को अलग कर 'आगरा प्रेसीडेन्सी' बनाया गया तथा प्रदेश को 'उत्तर-पश्चिमी प्रान्त' नाम दिया गया और इसका मुख्यालय आगरा बनाया गया।

अवध को 1856 ई. में लॉर्ड डलहौजी द्वारा 'उत्तर-पश्चिमी' नाम दिया गया।

दिल्ली डिवीजन को 1858 ई. में उत्तर-पश्चिमी पृथक कर इसकी राजधानी आगरा से प्रयागराज स्थानांतरित कर दी गई।

उत्तर-पश्चिमी प्रान्त एंव अवध के रूप में बँटे तत्कालीन उत्तर प्रदेश को लेफ्टिनेंट गवर्नर और चीफ कमीश्नर के अधीन कर दिया प्रान्त से गया।

दिल्ली डिवीजन को 1858 ई. में उत्तर-पश्चिम प्रान्त से पृथक कर इसकी राजधानी आगरा से प्रयागराज स्थानांतरित कर दी गई।

उत्तर-पश्चिमी प्रान्त एंव अवध के रूप में बँटे तत्कालीन उत्तर प्रदेश को लेफ्टिनेंट गवर्नर और चीफ कमीश्नर के अधीन कर दिया गया।

उत्तर-पश्चिम प्रांत और अवध को एकीकृत कर 1877 ई. में लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन कर दिया गया तथा इस एकीकृत प्रदेश का नाम ‘उत्तर-पश्चिमी प्रान्त, आगरा और अवध' कर दिया गया।

1902 ई. से इस प्रदेश का नाम 'आगरा और अवध का संयुक्त प्रान्त' कर दिया गया।

भारत सरकार अधिनियम, 1919 के प्रावधानों के तहत तत्कालीन उत्तर प्रदेश को लेफ्टिनेंट गवर्नर की जगह गर्वनर के अधीन कर दिया गया।

1921 ई. में प्रदेश की राजधानी प्रयागराज से लखनऊ हस्तांतरित कर दी गई तथा प्रदेश का उच्च न्यायालय प्रयागराज में ही बना रहा।

इस प्रदेश का नाम संयुक्त प्रान्त 1937 ई. में कर दिया गया।

26 जनवरी, 1950 को प्रदेश का नाम संयुक्त प्रान्त से बदलकर उत्तर प्रदेश कर दिया गया।

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत 1 नवम्बर 1956 को उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन किया गया।

9 नवम्बर, 2000 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश के 13 पर्वतीय जनपदों को अलग करके उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया।


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