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उत्तर प्रदेश में विज्ञान-प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण संरक्षण

उत्तर प्रदेश में विज्ञान-प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण संरक्षण

नमस्कार दोस्तों, Exams Tips Hindi शिक्षात्मक वेबसाइट में आपका स्वागत है। इस आर्टिकल में उत्तर प्रदेश में विज्ञान-प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण संरक्षण की जानकारी दी गई है। जैसा कि हम जानते है, उत्तर प्रदेश, भारत का जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश की प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत ज़्यादा कम्पटीशन रहता है। यह लेख उन आकांक्षीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो उत्तर प्रदेश सिविल सर्विस (UPPSC), UPSSSC, विद्युत विभाग, पुलिस, टीचर, सिंचाई विभाग, लेखपाल, BDO इत्यादि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है। तो आइए जानते है उत्तर प्रदेश में विज्ञान प्रौद्योगिकी से संबंधित जानकारी-


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उत्तर प्रदेश में विज्ञान-प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण संरक्षण

➤ प्रदेश सरकार के 'विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन 1975 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद का गठन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संबंधी शोध एवं विकास के लिए एक स्वायत्तशासी संस्था के रूप में किया गया।

यह परिषद शोधों के लिए प्रोत्साहन, बायोटेक्नोलाजी विकास, नक्षत्रशला विकास, उद्यमिता विकास, चिकित्सा, क्षेत्रीय एवं राज्य स्तरीय अवस्थापना विकास, कृषि एवं जैव सम्बंधी शोध एवं विकास आदि से सम्बंधित परियोजनाओं पर कार्य कर रही है।

परिषद के कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने के लिए अब तक आगरा, वाराणसी, बरेली, मुरादाबाद एवं गौतम बुद्ध नगर में पाँच क्षेत्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केन्द्र स्थापित किये जा चुके हैं।

परिषद द्वारा संचालित कुछ प्रमुख कार्यक्रम परियोजनाएँ इस प्रकार हैं


प्रौद्योगिकी विकास उन्नयन एवं हस्तांतरण : प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा जनमानस की भागीदारी वाली परियोजनाओं के अन्तर्गत पूरी हो चुकी कुछ प्रमुख परियोजनाएँ इस प्रकार हैं इंडिया मार्क-2, हैण्डपम्प के नये मॉडल का विकास, राइस हलर्स का आधुनिकीकरण, माइक्रो हाइडिल प्रदर्शन इकाई का विकास आदि।


शोध प्रोत्साहन योजना : योजना के अन्तर्गत रसायन विज्ञान, कृषि विज्ञान, भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, आयुर्विज्ञान, भू-विज्ञान इत्यादि के चयनित क्षेत्रों में प्रदेश स्थित विश्वविद्यालयों, कृषि विश्वविद्यालयों, किंग जार्ज चिकित्सा, विश्वविद्यालय तथा इनके अधीन शोध संस्थाओं के माध्यम से शोध परियोजनाओं के क्रियान्वयन हेतु मूल्यांकन एवं समर्थन किया जाता है। प्रायः 3 वर्ष हेतु स्वीकृत की जाती हैं।

2007-08 में 35 वर्ष तक के युवा वैज्ञानिकों को शोध कार्य में प्रोत्साहन देने के लिए यंग साइंटिस्ट स्कीम शुरू की गयी है।

इस स्कीम के तहत प्रदेश में स्थित संस्थानों में शोधरत विशेष युवा वैज्ञानिकों को 3 वर्ष तक अनुदान दिये जाते हैं।

2007-08 में 40 वर्ष तक की आयु सीमा वाले युवा वैज्ञानिकों को शोध कार्य में प्रोत्साहन हेतु यंग साइंटिस्ट विजिटिंग फेलोशिप शुरू की गई थी। इस स्कीम का लाभ उन शोधार्थियों को मिलता है जो राज्य के बाहर (लेकिन विदेश नहीं) किसी संस्था में शोध कर रहे हों।


राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस : 1993 राज्य स्तरीय संगठन 'विकास' (प्रयागराज) के माध्यम से प्रत्येक वर्ष बाल विज्ञान कांग्रेस का आयोजन भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद एवं राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के संयुक्त तत्वाधान में किया जाता है। इसमें 10 से 17 वर्ष के बच्चों के प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए जाते है।


वैज्ञानिक जागरूकता आयोजन : बच्चों एवं युवाओं में वैज्ञानिक जागरुकता लाने के लिए प्रदेश में कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जाते रहते हैं। जैसे- राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन, बौद्धिक सम्पदा जागरुकता अभियान, वैज्ञानिक मॉडल प्रतियोगिताएँ, वैज्ञानिकों द्वारा व्याख्या दिलाना, वैज्ञानिक निबन्ध प्रतियोगिता, प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आदि।


सेन्टर ऑफ एक्सीलेन्स : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विशिष्ट क्षेत्रों में शोध एवं विकास हेतु आधारभूत ढाँचा, कैपसिटी बिल्डिंग तथा मानव संसाधन के उच्चीकरण हेतु 11वीं योजना में राज्य में कई सेन्टर ऑफ एक्सीलेन्स स्थापित किये जाने हैं। इस क्रम में अब तक तीन सेन्टर ऑफ एक्सीलेन्स स्थापित किये जा चुके हैं (i) इन्सेफेलाइटिस पर रिसर्च के लिए पीजीआई, लखनऊ में (ii) मैटेरियल साइन्स पर रिसर्च हेतु अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय तथा एग्री-बायोटेक्नोलोजी के लिए मेरठ स्थिति कृषि विश्वविद्यालय में।


सुदूर संवेदन प्रौद्योगिकी : लखनऊ में 1982 में प्राकृतिक संसाधनों सम्बंधी शुद्ध आंकड़ों को प्राप्त करने के उद्देश्य से सुदूर संवेदन उपयोग केन्द्र की स्थापना की गयी।


उत्तर प्रदेश में वैज्ञानिक सम्मान : प्रदेश में कार्यरत वैज्ञानिकों को राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा निम्न पुरस्कार दिये जाते हैं विज्ञान गौरव सम्मान (5 लाख, । वैज्ञानिक), विज्ञान रल सम्मान (2.50-2.50 लाख, दो वैज्ञानिकों), युवा वैज्ञानिक सम्मान (1-1 लाख, 5 वैज्ञानिकों), नवअन्वेषक सम्मान (25-25 हजार, शिक्षक), बाल वैज्ञानिक सम्मान (25-25 हजार, 18 वर्ष से कम आयु के 5 बाल वैज्ञानिकों को)।


एजूसेट : इसरो व विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद तथा राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के संयुक्त तत्वाधान में लखनऊ स्थित परिषद के आडिटोरियम में सेटेलाइट बेस कम्प्यूटर इन्ट्रैक्टिव सेन्टर की स्थापना की गई है। अप्रैल 2009 से इस सेन्टर द्वारा विज्ञान के विभिन्न विषयों पर व्याख्यान के माध्यम से शिक्षण कार्य किया जा रहा है।


जैव प्रौद्योगिकी सम्बंधी पहल : चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, खाद्यान्न एवं पोषक तत्व प्रबन्धन, पर्यावरण एवं ऊर्जा आदि क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी के बहुआयामी उपयोग सम्बंधी विशेष पहल सर्वप्रथम 1998-99 में

शुरू किया गया।


विज्ञान क्लब : परिषद के नियंत्रण में वैज्ञानिक गतिविधियों के प्रोत्साहन के लिए प्रदेश के प्रायः सभी जिलों में विज्ञान क्लबों की स्थापना की गई है।


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उद्यमिता पार्क : प्राविधिक शिक्षा ग्रहण कर रहे युवकों को निजी उद्योग स्थापित करने हेतु आवश्यक जानकारी एवं प्रेरणा देना इसका उद्देश्य है। इस प्रकार के दो पार्क एच.बी.टी.आई. कानपुर में स्थापित किये जा रहे हैं।


जैव प्रौद्योगिकी पार्क, लखनऊ : बायो फर्टिलाइजर्स, बायो पेस्टीसाइड्स, एंटीबायोटिक्स, डायग्नोस्टिक किट्स, प्राकृतिक उत्पाद के अतिरिक्त प्लांट टिशू कल्चर पर आधारित उक्त अनुवांशिक पदार्थों के वृहद उत्पादन के वाणिज्यीकरण हेतु बायोटेक पार्क, लखनऊ में पायलट फेसिलिटीज बायोटेक्टनोलॉजी विभाग, भारत सरकार की सहायता से विकसित की जा रही है। बायोटेक पार्क, लखनऊ स्वायत्तशासी संस्था के रूप में स्थापित किया गया है।


जैव उर्वरक परियोजना : लखनऊ में 2006 से बक्शी तालाब स्थित बायोटेक नेटवर्किंग फैसिलिटी केन्द्र पर नील हरित शैवाल जैव उर्वरक के उत्पादन, प्रशिक्षण, प्रदर्शन एवं विकास हेतु परियोजना संचालित की जा रही है। यहां जैव उर्वरक का उत्पादन, कृषकों को जैव उर्वरक उत्पादन सम्बंधी प्रशिक्षण, प्रदर्शन आदि किया जाता है।


जैव प्रौद्योगिकी नीति-2004 : प्रदेश को जैव-प्रौद्योगिकी पर आधारित निवेश को आकर्षित करने, जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रमुख स्थान दिलाने, जैव-प्रौद्योगिकी शोध एवं विकास को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से इस नीति की घोषणा की गयी। इस नीति में एक जैव प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड के गठन का भी प्रावधान किया गया है।


जैव प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड : 3 अक्टूबर, 2004 को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में जैव प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड का गठन किया गया है। बोर्ड का मुख्य उद्देश्य प्रदेश को जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रमुख स्थान दिलाना

है।


नक्षत्रशालाएँ : प्रदेश में खगोलिकी के प्रति लोगों में जागरूकता एवं अभिरुचि उत्पन्न करने के लिए क्रिशील नक्षत्रशालाएँ हैं:

(i) जवाहर नक्षत्रशाला : यह प्रयागराज के आनंद भवन परिसर में स्थित है। इसका शुभारम्भ 29 नव. 1980 को

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा किया गया था। मार्च 2012 में इसमें अत्याधुनिक मशीन (डिजिटल सिस्टम) लगाई गई और सीटों की संख्या 80 से बढ़ाकर 96 कर दी गयी है।

(ii) इंदिरा गाँध नक्षत्रशाला लखनऊ : यह लखनऊ में गोमती नदी के किनारे सूरजकुण्ड पार्क के समीप स्थित है।

224 सीटों की क्षमता वाला इंदिरा गाँधी नक्षत्रशाला का संचालन 9 मई 2008 से किया जा रहा है।

(iii) आर्यभट्ट नक्षत्रशाला : यह रामपुर में स्थित है। लेजर तकनीक पर आधारित यह भारत की पहली नक्षत्रशाला है। पहले इसका नाम डॉ. भीमराव अम्बेडकर नक्षत्रशाला था।

(iv) वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला : गोरखपुर में रामगढ़ ताल परियोजना के अन्तर्गत स्थित 400 सीटों की क्षमता के इस नक्षत्रशाला का संचालन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा किया जा रहा है।

(v) मोबाइल नक्षत्रशाला : उत्तर प्रदेश के सुदूर जनपदों में खगोल विज्ञान के प्रचार-प्रसार हेतु राज्य में दो मोबाइल नक्षत्रशालाएँ स्थापित की गयी हैं।


उत्तर प्रदेश में सूचना प्रौद्योगिकी

1974 में राज्य सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना की गई थी।

1998 में शासन द्वारा इलेक्ट्रॉनिक विभाग के नाम में परिवर्तन करके नया नाम आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग दिया गया।

सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अन्तर्गत यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन लिमिटेड तथा यूपीडेस्को कार्यरत हैं।

यूपीएसआईडीसी, एनआईसी, एसटीपीआई, सी-डैक जैसे अन्य संगठनों के सहयोग से भी राज्य में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की परियोजनायें उत्तर प्रदेश में कार्यान्वित की जा रही हैं।

उत्तर प्रदेश में सूचना प्रौद्योगिकी से सम्बंधित कुछ प्रमुख परियोजनाएँ इस प्रकार हैं-


नेशनल ई-गवर्नेस प्रोगाम : केन्द्र द्वारा संचालित इस योजना का लक्ष्य अधिक से अधिक प्रशासनिक कार्यों को

इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में लाते हुए डाटाओं साथ ही प्रशासनिक सेवाओं को लोगों को आसानी से उपलब्ध कराना भी इसका लक्ष्य है।


ई-डिस्ट्रिक्ट परियोजना : जनवरी 2007-08 में ई-गवर्नेंस योजना के अन्तर्गत प्रदेश के जनमानस को उनके द्वार के समीप विभिन्न प्रकार की शासकीय सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी सिस्टम द्वारा एकल खिड़की से उपलब्ध कराने के उद्देश्य में राज्य के 6 जिलों (गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, गोरखपुर, रायबरेली, सुल्तानपुर एवं सीतापुर) में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में

यह योजना लागू की गई थी। 1 जनवरी 2010 में इसे पूरे प्रदेश में लागू दिया गया है। उत्तर प्रदेश ऐसा करने

वाला देश का पहला राज्य है।

इस परियोजना के अन्तर्गत आय, निवास, जाति, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, वृद्धावस्था, विकलांग एवं विधवा पेंशन, राजस्व न्यायालय सेवायें तथा सार्वजनिक वितरण आदि से सम्बधित 193 सेवाएं प्रदान की जाती हैं।

विभिन्न सेवाओं को ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इस योजना के अंतर्गत पी.पी.पी. मॉडल पर जनसेवा लोकवाणी केन्द्रों (कॉमन सर्विस सेन्टर) की स्थापना की जा रही है।


स्टेट डाटा सेंटर : लखनऊ स्थित यूपी डेस्को भवन में 14 विभागों की 196 सेवाओं का एक स्टेट डाटा सेंटर स्थापित किया गया है। यह सेंटर उन सभी सम्बंधित विभागों की जानकारियों सूचनाएँ रखता है, जिनकी आवश्यकता जनसेवा केन्द्रों के माध्यम से जरूरतमंद लोगों को पड़ती है।


सेंटर फॉर ई-गवर्नेन्स, उत्तर प्रदेश : मार्च, 2006 को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस प्लान के अंतर्गत योजनाओं के प्रबंधन, स्टेट ई-मिशन टीम तथा अन्य सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अधीन इसका गठन किया गया। इस संगठन द्वारा नेशनल ई-गवर्नेंस प्लान के तहत राज्य में स्वॉन, कॉमन सर्विस सेन्टर गेट-वे, स्टेट पोर्टल, ई-फार्स, ई-डिस्ट्रिक्ट, स्टेट सर्विस डिलीवरी, स्टेट डाटा सेन्टर आदि कार्य किये जा रहे हैं।


मेगा कॉल सेन्टर : 3 अक्टूबर, 2016 से सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार मिटाने हेतु प्रदेश में 500 मेगा कॉल सेंटर का संचालन किया जा रहा है।


वूमेन पावर हेल्प लाइन-1090 : प्रदेश की महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से वूमेन पावर हेल्प- 1090 की सेवाओं के लिए उत्तर प्रदेश फलिस द्वारा एस.पी.आई. मॉडल पर आधरित 'संवेदन साल्यूशन को पोर्टल www.1090up.in के रूप में यूपीडेस्को के माध्यम से 15 नवम्बर, 2012 से संचालित कराया जा रहा है।


स्वान परियोजना :  केन्द्रीय ई-गवर्नेस योजना के अन्तर्गत राज्य में शासकीय डाटा एवं सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान के लिए 2 एम.बी.पी.एस. बैण्डविड्थ का स्टेट वाईड एरिया नेटवर्क (स्वान) स्थापित किये गये हैं।

इसमें ब्लाक स्तर पर कुल 885 नेटवर्क केन्द्र स्थापित किये गये हैं।


डायल 100 : 19 नवम्बर, 2016 से प्रदेश में लोगों को शीघ्र सहायता पहुंचाने हेतु यह योजना चलाई जा रही है। यह भी यूपीडेस्को के माध्यम से चलाई जा रही है।


यूपीडेस्को : 15 मार्च 1977 को उत्तर प्रदेश डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड (यूपीडेस्को) की स्थापना की गयी।

यह निगम शासन द्वारा अधिकृत एक कंपनी है तथा आई.टी. एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अधीन है। इसकी स्थापना का उद्देश्य योजनाओं एवं कार्यक्रमों के मूल्यांकन को तकनीकी विकल्प देना, डाटा प्रणाली में सहायता करना तथा प्रबन्धकीय समस्याओं का निराकरण करना है।


यू.पी. इलेक्ट्रानिक्स कार्पोरेशन लि. : इसका गठन 1974 में राज्य के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के अन्तर्गत एक निगम के रूप में किया गया। 1976 में इसे एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में पुनर्गठित किया गया। इस कम्पनी के मुख्य उद्देश्य है । इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ाना देना, राज्य में इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के विकास सम्बंधी योजनाओं के संचालन हेतु राज्य के एजेंट के रूप में कार्य करना, राज्य सरकार के 'स्मार्ट स्टेट' के लक्ष्य की पूर्ति हेतु ई-गर्वेन्स, ई-कॉमर्स, दूरस्थ शिक्षा, साफ्टवेयर विकास, ई-विजनेस आदि क्षेत्रों में योगदान देना आदि। इस एजेंसी का राज्य में ई-गवर्नेंस प्लान को क्रियान्वित करने में विशेष योगदान है।


सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स : सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इण्डिया के सहयोग से यह योजना कार्यान्वित की जा रही है। वर्ष 1997-98 में सॉफ्वेयर टेक्नोलॉजी पार्क, नोएडा एवं कानपुर तत्पश्चात् वर्ष 2001 में लखनऊ एवं 2004 में इलाहाबाद के पार्क क्रियाशील हो गये। इसके बाद एक पार्क आगरा में स्थापित किया जा रहा है।


उत्तर प्रदेश में कृषि प्रौद्योगिकी

कृषि सम्बंधी शोध, शिक्षण, प्रशिक्षण तथा अनुसंधान के लिए प्रदेश में अनेक संस्थाएँ हैं, इनका विवरण निम्नवत है।


उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद् : उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद् की स्थापना प्रदेश में कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विभाग एवं कृषि से सम्बंधित शोध एवं शिक्षण में समन्वय स्थापित करने तथा कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए जुलाई, 1989 में लखनऊ में की गयी।


चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर : इस कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना मार्च, 1975 में की गयी थी। विश्वविद्यालय का कार्य क्षेत्र प्रदेश के बुन्देलखंड, दक्षिणी पश्चिमी अर्द्ध-शुष्क तथा मध्य मैदानी क्षेत्र के 30 जनपदों तक है। यह विश्वविद्यालय, कृषि शिक्षा, शोध एवं प्रसार द्वारा इन जनपदों के विकास हेतु प्रयासरत है।


भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान : सन् 1952 में इस संस्थान की स्थापना लखनऊ में की गयी। अखिल भारतीय समन्वित गन्ना सुधार परियोजना की समन्वयक इकाई इसी संस्थान में स्थित है। इसके साथ ही यह संस्थान अखिल भारतीय समन्वित गन्ना बीज उत्पादन परियोजना का भी समन्वय करता है।


कृषि विज्ञान केन्द्र : कृषि तकनीक के प्रसार हेतु भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (ICAR) द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र, केन्द्रीय प्रसार परियोजना है। यह देश भर में फैले अपने 300 कृषि विज्ञान केन्द्रों के द्वारा कृषकों, महिलाओं, मछुआरों, शिक्षित ग्रामीण युवकों तथा ग्राम स्तरीय कृषि प्रसार कार्यकर्ताओं को तकनीकी ज्ञान प्रदान कर रहा है।


सैम हिग्गिनबॉटम इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर, टेक्नोलॉजी एण्ड साइंसेज वि. वि. नैनी : यह संस्थान प्रयागराज के नैनी में स्थित है। इस कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विन्ध्य कृषि जलवायु जोन में कृषि शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रसार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा रहा है।


नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, फैजाबाद : इस कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना 1978 में हुई थी। यह विश्वविद्यालय पूर्वी उत्तर प्रदेश के 20 जिलों में कृषि शिक्षा, शोध एवं प्रसार के महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।


सरदार वल्लभभाई कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ : 2 अक्टूबर, 2000 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मेरठ, मुरादाबाद एवं बरेली मंडल में कृषि शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रसार हेतु उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ की स्थापना की गयी।


यू.पी. एग्रो-इण्डस्ट्रियल कार्पोरेशन : 29 मार्च, 1997 को इस निगम की स्थापना राज्य के कृषकों को रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशक, विभिन्न प्रकार के कृषि उपकरण औषधियों, प्रमाणित बीज आदि को उचित मूल्य पर आसानी से उपलब्ध कराने एवं कृषि पर आधारित उद्योगों की स्थापना के लिए की गयी थी।


बाँदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय : 2010 में इस विश्वविद्यालय की स्थापना बुन्देलखण्ड क्षेत्र को ध्यान में रखकर की गई ऊतक संवर्धन प्रयोगशाला, अलीगंज, लखनऊ : कृषकों को फल, शाकभाजी एवं फूलों जैसी औद्योगिकी फसलों के गुणात्मक उत्पादन हेतु व्यावसायिक स्तर पर उत्कृष्ट रोपण सामग्री (बीज) उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के अन्तर्गत अलीगंज प्रक्षेत्र में एक उत्तक संवर्धन प्रयोगशाला की स्थापना की गयी।


राजकीय फल संरक्षण एवं डिब्बाबंदी संस्थान, लखनऊ : राजकीय फल संरक्षण एवं डिब्बाबंदी संस्थान लखनऊ द्वारा फल तथा सब्जियों को सुरक्षित तथा संरक्षित रखने एवं उत्पाद का उसके उत्पादकों को उचित शोध कार्य संपादित किया जा रहा है।


उत्तर प्रदेश में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी

उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य चिकित्सा सम्बंधी शोध, शिक्षण, प्रशिक्षण एवं सेवा के लिए राज्य में एलोपैथिक, यूनानी, आयुर्वेदिक, दन्त कॉलेज आदि संचालित किए जा रह हैं। इनका विवरण इस प्रकार, 2 एलोपैथिक मेडिकल विश्वविद्यालय, 12 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज, 5 उच्चीकृत स्वायत्तशासी एलोपैथिक संस्थान, 8 आयुर्वेदिक कॉलेज, 8 होम्योपैथिक कॉलेज, 2 यूनानी कॉलेज, 29 निजी क्षेत्र के एलोपथिक मेडिकल कॉलेज, 23 निजी क्षेत्र के दन्त कॉलेज, 2 केन्द्रीय मेडिकल कॉलेज आदि।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत राज्य के मैदानी क्षेत्रों में प्रति 30 हजार एवं पहाड़ी/जनजातीय क्षेत्रों में प्रति 20 हजार ग्रामीण जनसंख्या पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित किया जाता है।

प्रत्येक 4 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों या ब्लाक स्तर पर 30 शैय्यायुक्त एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापना की जाती है।

फरवरी, 2014 में राज्य सरकार द्वारा घोषित नीति के अनुसार प्रति 30 हजार जनसंख्या पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बनाया जाएगा।

दो प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के बीच न्यूनतम दूरी पाँच किलोमीटर निर्धारित की गई है।

प्रति एक लाख की जनसंख्या पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित किया जाएगा।

प्रयागराज, लखनऊ, झाँसी एवं गोरखपुर के मेडिकल कॉलेजों में केन्द्र के सहयोग से कैंसर संस्थानों की स्थापना की जा रही है।

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय मानसिक चिकित्सालय वाराणसी एवं बरेली में हैं तथा एक स्वायत्त चिकित्सालय आगरा में कार्यरत है।

राज्य को अपमिश्रित खाद्य सामग्री एवं नकली तथा अधोमानक औषधियों से मुक्त करने एवं उसको प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए सितम्बर 2008 में खाद्य एवं औषधि प्राधिकरण एवं निदेशालय का गठन किया गया है।

एक राज्य स्तरीय तम्बाकू नियंत्रण प्रकोष्ठ की स्थापना राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम के तहत की गई है। लखनऊ एवं कानपुर में एक-एक जनपद स्तरीय प्रकोष्ठ भी स्थापित किए गये हैं।


राष्ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम : 1968 ई. में उत्तर प्रदेश में क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। 1992 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा क्षय रोग की विश्वव्यापी आपात घोषित करने के बाद केन्द्र सरकार ने 1993 में इसमें कुछ परिवर्तन करते हुए इसे पुनरीक्षित राष्ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम के रूप में लागू करने की पहल की जिसे 1995 में केवल लखनऊ में लागू किया गया।

दिसम्बर 2005 तक इस कार्यक्रम से पूरे प्रदेश को आच्छादित किया जा चुका है। इस कार्यक्रम में जाँच से उपचार तक सब निःशुल्क किया जाता है।

प्रत्येक एक लाख की आबादी पर सम्भावित क्षय रोगियों के जाँच एवं उपचार हेतु माइक्रोस्कोपी सेंटर एवं 5 लाख की आबादी पर एक टी.बी. सेन्टर स्थापित है।

5 से 10 हजार की आबादी पर औषधि खिलाने हेतु एक-एक डॉट्स केन्द्र खोले गये हैं।


राष्ट्रीय दृष्टिहीनता निवारण कार्यक्रम : केन्द्र की शत-प्रतिशत सहायता वाला यह कार्यक्रम प्रदेश में 1977 से चलाया जा रहा है।

इस कार्यक्रम का लक्ष्य प्रदेश में दृष्टिहीनता दर को 1% से घटाकर 0.3% पर लाना है।

इसके तहत निःशुल्क मोतियाबिन्द के लिए आपरेशन किया जाता है। 2007-08 से यह कार्यक्रम ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के ताल चलाया जा रहा है।


उत्तर प्रदेश हेल्थ सिस्टम डेवलपमेंट परियोजना : यह परियोजना सन् 2000 से विश्व बैंक के सहयोग से चलायी जा रही है।

इस परियोजना के तहत चिकित्सा इकाईयाँ का जीर्णोद्धार कर उन्हें मॉडल इकाई के रूप में विकसित किया जा रहा है।

प्रदेश में तीन स्थानों (मथुरा, फैजाबाद तथा मिर्जापुर) पर संक्रामक रोग चिकित्सालय स्थापित किये गये हैं।


राज्य स्वास्थ्य मिशन : राज्य सरकार ने निर्धन और सामान्य स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित वर्ग को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने के लिए 10 सितंबर, 2005 को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में 'राज्य स्वास्थ्य मिशन' गठित करने का निर्णय लिया है।

इसका मुख्य उद्देश्य वर्ष 2005-2012 के अन्दर मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में 50 प्रतिशत की कमी लाना है।

जनता को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सम्बंधी सभी सेवाएँ और सुविधाएँ उपलब्ध कराने के साथ-साथ स्वच्छ पेयजल, वातावरण की स्वच्छता और समुचित पोषण पर ध्यान देकर उसके समग्र स्वास्थ्य की रक्षा और विकास करना इस मिशन का उद्देश्य है।

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) को पहल पर राज्य में प्रथम एड्स चिकित्सालय की स्थापना कानपुर मेडिकल कॉलेज में की गयी है। इसके अतिरिक्त 5 एड्स सर्विलेंस सेन्टर तथा 13 क्षेत्रीय रक्त परीक्षण केन्द्र भी प्रदेश में कार्यरत हैं।

सड़क दुर्घटना चिकित्सा नेटवर्क की स्थापना लखनऊ में केन्द्र सरकार की चिकित्सा योजना के तहत इस नेटवर्क की स्थापना 2009 में कुष्ठ रोग में कमी लाने के लिए मल्टी ड्रग थेरेपी राज्य में चलायी जा रही है।

राज्य में वर्तमान में कुल 2358 आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सालय हैं। उत्तर आयुर्वेदिक यूनानी औषधियों के निर्माण हेतु लखनऊ एवं पीलीभीत में औषधि निर्माणशालाएँ हैं।

प्रदेश में वर्तमान में कुल 1575 राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय हैं, जिनमें से 121 शहरी क्षेत्रों में शेष ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत


उत्तर प्रदेश में पर्यावरण, प्रदूषण व उपाय

राज्य में पर्यावरण एवं उसके संरक्षण हेतु पर्यावरण निदेशालय की स्थापना 1976 में की गई थी। इस निदेशालय के माध्यम से राज्य में पर्यावरण सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन तथा प्रदूषण नियंत्रण हेतु विविध उपाय किये जा रहे हैं।

मेरठ और वाराणसी में पर्यावरण निदेशालय के क्षेत्रीय कार्यालय हैं।

उत्तर प्रदेश में 1975 में 'उत्तर प्रदेश जल प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण बोर्ड' का गठन किया गया है।

राज्य में पूर्व गठित जल प्रदूषण बोर्ड को ही वायु प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण का भी दायित्व सौंपा गया है।

13 जुलाई, 1982 में राज्य सरकार द्वारा उक्त राज्य बोर्ड का नाम बदलकर 'उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' विनिर्दिष्ट कर दिया गया।

भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, द्वारा 1998 में जैव चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंध न एवं हस्तन) अधिनियम, 1998 पारित किया गया। इसके अनुपालन का उत्तरदायित्व भी उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपा गया है।

प्रदेश में प्रदूषण की रोकथाम के लिए लखनऊ स्थित बोर्ड मुख्यालय के अतिरिक्त 25 क्षेत्रीय कार्यालयों की स्थापना की गई है।


गंगा कार्य योजना- गंगा में प्रदूषण को कम कर उसे स्नान योग्य बनाने अर्थात बायोलोजिकल आक्सीजन डिमान्ड (बी.ओ. डी.) की मात्रा अधिकतम 3 एमएल/लीटर तथा डिजाल्ड ऑक्सीजन (DO) की मात्रा न्यूनतम 5 एमएल लीटर तक सीमित करने के लिए फरवरी 1985 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण का गठन कर शतप्रतिशत केन्द्रीय योगदान से गंगा कार्य योजना शुरू की गई।

प्रथम चरण में इसमें केवल 5 नगरों (प्रयागराज फर्रुखाबाद, फतेहगढ़, कानपुर, वाराणसी एवं मिर्जापुर) को ही शामिल किया गया था। इस चरण में इन नगरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, शवदाहगृह, पंप स्टेशन आदि बनाये गये।

1993 में गंगा एवं उसकी सहायक नदियों के तट पर स्थित कुल 23 नगरों (प्रथम चरण के 5 नगर सहित गंगा कार्य योजना का द्वितीय चरण शुरू हुआ। इस चरण में यमुना एवं गोमती सम्मिलित को सम्मिलित करने हुए इसके तीन घटक बना दिये गये हैं गंगा कार्य योजना, यमुना कार्य योजना एवं गोमती कार्य योजना।

गंगा कार्ययोजना के द्वितीय चरण में गंगा किनारे के 7 नये नगरों (कुल 12) को शामिल किया गया है।

यमुना कार्य योजना में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, आगरा, मथुरा, वृन्दावन एवं इटावा आदि 8 नगरों को शामिल किया गया है। इस योजना में जापान सरकार द्वारा सहयोग दिया जा रहा है।

गोमती कार्य योजना में लखनऊ, सुल्तानपुर एवं जौनपुर सम्मिलित हैं।


गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण : नवम्बर, 2009 में उत्तर प्रदेश राज्य गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण का गठन केन्द्र की तर्ज पर किया गया है। गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण राज्य में गंगा नदी के संरक्षण और उसके प्रदूषण के प्रभावी रोकथाम के उपाय तथा राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के फैसलों और निर्देशों के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक कार्यवाही भी करता है। मुख्यमंत्री इस प्राधिकरण के पदेन अध्यक्ष एवं मुख्य सचिव पदेन सदस्य-सचिव हैं।


सीवेज शोधन संयंत्र (STP) : शहरी गन्दे जल को शोधित कर नदी में डालने के लिए शहरों के किनारों से गुजरने वाली नदियों में एसटीपी लगाये जा रहे हैं। गंगा एक्शन प्लान के तहत प्रयागराज, कानुपर, फर्रुखाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर, विन्ध्याचल, अनूपशहर (बुलन्दशहर) तथा मुजफ्फरनगर में एसटीपी लगाये जा चुके हैं।

यमुना एक्शन प्लान के तहत सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, मथुरा, वृंदावन, आगरा एवं इटावा में

एसटीपी लग चुके हैं। लखनऊ में भी एसटीपी लगाया जा चुका है।

अभी तक प्रदेश में 34 एसटीपी स्थापित हो चुके हैं।

राज्य में नोएडा पहला ऐसा नगर है जहाँ शत प्रतिशत सीवेज शोधन क्षमता है।


जल-वायु गुणवत्ता का अनपुरवण : उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में 01 केन्द्रीय प्रयोगशाला, लखनऊ तथा 14 क्षेत्रीय प्रयोगशालायें स्थापित हैं। प्रयोगशालाओं द्वारा वर्तमान में औद्योगिक उत्प्रवाहों के नमूने, नदियों, नालों के नमूने, परिवेशीय वायु गुणवत्ता तथा ध्वनि प्रदूषण के अनपुरवण का कार्य सम्पादित किया जाता है।


नेशनल एयर क्वालिटी मानीटरिंग प्रोग्राम : के अन्तर्गत प्रदेश के 21 प्रमुख नगरों के 62 चिन्हित स्थलों पर परिवेशीय वायु गुणवत्ता का अनुश्रवण कार्य सम्पादित किया जाता है। यह परियोजना भी केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नई दिल्ली द्वारा वित्त पोषित है।

गोमती अनपुरवण : इस अध्ययन के अन्तर्गत गोमती नदी के जल का अनपुरवण (जांच) प्रतिदिन लखनऊ शहर में किया जाता है, जिससे गोमती नदी के जल की गुणवत्ता का ज्ञान होता रहे।


झील प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रम : इस कार्यक्रम के तहत प्रदेश की नीला (रामगढ़ गोरखपुर, मानसीगंगा-मथुरा लक्ष्मीताल-झाँसी एवं मदन सागर-महोबा) को सम्मिलित किया गया है।


नेशनल वाटर क्वालिटी मानीटरिंग प्रोग्रामः इस परियोजना के अन्तर्गत प्रदेश की विभिन्न नदियों के 58 चिन्हित स्थलों पर जल गुणता अनपुरवण का कार्य एक माह में एक बार किया जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नई दिल्ली द्वारा यह परियोजना वित्त पोषित है।

वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु बनाई गई कार्य योजना के अंतर्गत वर्तमान में लखनऊ, कानपुर, आगरा, बरेली, गाजियाबाद एवं गौतम बुद्ध नगर आदि शहरों में वाहनों के संचालन हेतु सीएनजी की आपूर्ति की जा रही है। लखनऊ एवं कानपुर में अप्रैल, 2006 से ही सी. एन.जी. की आपूर्ति शुरू है।

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ध्वनि एवं वायु प्रदूषण के नियंत्रण हेतु परिवहन विभाग एवं यातायात फलिस के सहयोग से समय-समय पर चलाये जाने वाले अभियानों में वाहनों के उत्सर्जन की जाँच, पी.यू.सी, प्रमाण पत्र की जाँच, तथा डीजल चलित टेम्पो में स्केवर संचालन व्यवस्था की भी जाँच की जाती है। 

सभी अस्पतालों, शैक्षिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों एवं न्यायालयों के आसपास कम से कम 100 मीटर के क्षेत्र को शान्त क्षेत्र घोषित किया गया है।


पर्यावरणीय सूचना प्रणाली : केन्द्र द्वारा विविध संस्थाओं विभागों के माध्यम से पर्यावरण से सम्बंधित डाटावेस बनाये जाने और इसके माध्यम से सूचनाएँ उपलब्ध कराने सम्बंधी यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है। अप्रैल 2005 से उत्तर प्रदेश में इस पर्यावरणीय सूचना प्रणाली के तहत पर्यावरणीय सूचना प्रणाली केन्द्र शुरू हुए हैं।


प्रदूषणकारी उद्योगों के संबंध में प्रावधन : वर्तमान में उत्तर प्रदेश में 553 अतिप्रदूषणकारी (ऐसे उद्योगों को जिनका बी.ओ.डी. लोड 100 किग्रा दिन से ज्यादा या टाक्सिस उत्प्रवाह है) चिन्हित किया गया है।

ये उद्योग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उत्तर प्रदेश में प्रवाहित होने वाली गंगा, यमुना, गोमती, रामगंगा, हिण्डन, सरयू, काली इस्ट, काली वेस्ट, घाघरा, राप्ती, सई, रिहन्द एवं शारदा नदियों में एवं विभिन्न तालाबों में अपना उत्प्रवाह निस्तारित करते हैं।

435 उद्योगों में जल शोधक यंत्र (ETP) लगाया जा चुका है और शेष 118 बन्द हो चुके हैं।

उत्तर पदेश में बढ़ती हुई पॉलीथीन समस्या को दृष्टिगत रखते हुए बोर्ड द्वारा प्रदेश के कई नगरों में पॉलीथीन जन-जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।

इस अभियान के तहत जनता को पॉलीथीन के दुष्प्रभावों की जानकारी दी जाती है तथा जनता से पॉलीथीन के स्थान पर कागज एवं कपड़े के थैले का प्रयोग करने हेतु अनपुरोध किया जाता है।

राज्य में मार्च, 2011 से 40 माईक्रॉन मोटाई तक की पोलिथीन थैलियाँ प्रतिबंधित कर दी गई है। 1999 से अभी तक 20 माईकान मोटाई तक की पन्नियाँ ही प्रतिबंधित थीं। राज्य सरकार द्वारा जारी नए नियमों के मुताबिक अब भारतीय मानक ब्यूरो से स्वीकृत रिसाइकिल्ड कैरी बैग्स का प्रयोग किया जा सकेगा। यह कैरी बैग्स सफेद होने चाहिए।


पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 : के तहत 21 जनवरी, 2016 से प्लास्टिक कैरी बैग के बनाने-बेचने के साथ। इसके आयात, भंडारण या ढुलाई करने को पूरे प्रदेश में प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस प्रतिबंध में सिर्फ उन प्लास्टिक थैलों को छूट है, जिनका इस्तेमाल बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट में किया जाता है।

विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून), अन्तर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (22 मई), दिवस तथा अन्तर्राष्ट्रीय ओजोन संरक्षण दिवस (16 सितम्बर) पर प्रदेश भर में अनेक कार्यशालाओं, गोष्ठियों आदि का आयोजन किया जाता है।


उत्तर प्रदेश में पर्यावरण सम्बंधी पुरस्कार : प्रदेश सरकार द्वारा पर्यावरण सम्बंधी उत्कृष्ट कार्यों के लिए उत्तर प्रदेश पर्यावरण पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं।

ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए 1999 से शुरू 'ताज ट्रेपेजियम' परियोजना का कार्य विभिन्न कार्यदायी विभागों/संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है।

इसके लिए वित्तीय संसाधनों को उपलब्ध कराये जाने हेतु 31 मई, 1999 को ताज ट्रेपेजियम पर्यावरण संरक्षण निधि की स्थापना की गई।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा देश के सभी राज्यों तथा केन्द्र शासित क्षेत्रों में नेशनल ग्रीन कोर योजना चलाई जा रही है। इस ग्रीन कोर योजना का उद्देश्य स्कूली छात्र-छात्राओं में पर्यावरणीय जागरूकता पैदा करना तथा पर्यावरणीय गतिविधियों में बच्चों की सहभागिता सुनिश्चित कराना है।

योजना के अन्तर्गत शासन द्वारा स्टेट स्टेयरिंग कमेटी का गठन किया गया है।

इस योजना के तहत प्रत्येक जिले के 250 विद्यालयों में इको क्लब गठित करने की व्यवस्था है। इसके लिए प्रत्येक चयनित विद्यालय को 2.5 लाख रुपये प्रतिवर्ष प्रदान किए जाते हैं।


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