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उत्तर प्रदेश के पर्यटन, ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल

उत्तर प्रदेश के पर्यटन, ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल

नमस्कार दोस्तों, Exams Tips Hindi शिक्षात्मक वेबसाइट में आपका स्वागत है। इस आर्टिकल में उत्तर प्रदेश के पर्यटन, ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल संबंधित जानकारी दी गई है। जैसा कि हम जानते है, उत्तर प्रदेश, भारत का जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश की प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत ज़्यादा कम्पटीशन रहता है। यह लेख उन आकांक्षीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो उत्तर प्रदेश सिविल सर्विस (UPPSC), UPSSSC, विद्युत विभाग, पुलिस, टीचर, सिंचाई विभाग, लेखपाल, BDO इत्यादि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है। तो आइए जानते है उत्तर प्रदेश में पर्यटन स्थल, उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक स्थल, उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्थल से संबंधित जानकारी-


उत्तर प्रदेश में पर्यटन स्थल, उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक स्थल, उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्थल
उत्तर प्रदेश के पर्यटन, ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल

उत्तर प्रदेश में प्राचीन काल से ही कई राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, धार्मिक, दार्शनिक, शैक्षिक एवं कलात्मक केंद्रों को पर्यटन की दृष्टि से पुनर्विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस कार्य हेतु 1958 में स्थापित पर्यटन विभाग व 1972 में स्थापित पर्यटन निदेशालय सक्रिय है

पर्यटन संबंधी व्यावसायिक कार्यकलापों की देखरेख के लिए 1974 में पर्यटन विकास निगम की भी स्थापना की गई थी।

पर्यटन में रोजगार हेतु इच्छुक व्यक्तियों को पर्यटन संबंधी शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए मा. कांशीराम पर्यटन प्रबंध संस्थान, चिन्हट (लखनऊ) की स्थापना की गई है।

इसके अतिरिक्त अलीगढ़ में एक फूड क्राफ्ट इन्स्टीट्यूट भी है।

प्रदेश में पर्यटन के विकास के लिए वर्ष 1998 में प्रख्यापित राज्य की प्रथम पर्यटन नीति में सात परिपथ चयनित किए गए थे जो इस प्रकार हैं

(i) बृज परिपथ (मथुरा, वृंदावन, आगरा तथा श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े क्षेत्र

(ii) बुंदेलखंड परिपथ (झांसी, ललितपुर, देवगढ़, कालिंजर, चित्रकूट तथा निकटवर्ती क्षेत्र),

(iii) बौद्ध परिपथ (भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र स्थल),

(iv) विन्ध्य परिपथ (विन्ध्याचल तथा सोनभद्र से जुड़े क्षेत्र),

(v) अवध परिपथ (लखनऊ तथा इलाहाबाद व उनके मध्य का क्षेत्र),

(vi) वन, इको एंव साहसिक पर्यटन परिपथ (प्रदेश में स्थत वन जीव अभ्यारण्य, का विहार, इको पर्यटन स्थल) व

(vii) जल विहार परिपथ (ऐसे क्षेत्र जहां जल क्रीड़ा की संभावनाएं हैं)।

उत्तर प्रदेश में जून 2015 में ग्रामीण पर्यटन नीति की घोषणा की गई। इस नीति के तहत ऐसे गांवों को चिन्हत कर विकसित किये जाने की व्यवस्था है, जो मुख्य पर्यटन स्थल व परिपथ के समीप हो जाने जहां पर्यटन की संभावनाएं हों। सरकार ऐसे किसी ग्राम के लिए अधिकतम दो करोड़ रुपये (एक करोड़ प्रति वर्ष) तक की धनराशि स्वीकृत करती है। एक वर्ष में अधिकतम तीन ग्राम चयनित किए जाते हैं।

ग्रामीण पर्यटन नीति के अनुसार 1950 से पहले निर्मित घरों व हवेलियों को पर्यटकों के लिए अवासीय व्यवस्था के रूप में विकसित करने के लिए अधिकतम 5 लाख रुपए देने की व्यवस्था है।

नई पर्यटन नीति, 2016 के तहत पर्यटन क्षेत्रों के विकास हेतु 7 नए परिपथ चयनित किए गए हैं जो इस प्रकार हैं-

(i) हेरिटेज आर्क (आगरा-लखनऊ-वाराणसी) परिक्षेत्र,

(ii) महाभारत परिपथ (महाभारत काल से जुड़े स्थल),

(iii) रामायण परिपथ (रामायण में उल्लिखित स्थल),

(iv) जैन परिपथ (जैन धर्म से जुड़े स्थल)

(v) सूफी परिपथ (सूफीवाद से जुड़े प्रमुख स्थल),

(vi) स्वतंत्रता संग्राम परिपथ (स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े स्थल),

(vii) क्यूजीन और कल्चर परिपथ (हस्तशिल्प, व्यंजन और विशिष्ट सांस्कृतिक केंद्र)। 


उत्तर प्रदेश में हेरिटेज आर्क

प्रदेश में सबसे अधिक विदेशी पर्यटक आगरा, लखनऊ व वाराणसी शहरों में ही आते हैं। इस कारण इन शहरों को हैरिटेज आर्क के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया है।

इसमें 12 से 15 जिलों का दायरा शामिल किया गया है। हेरिटेज आर्क के तहत इन तीनों नगरों में सड़क सहित सभी स्तर के बुनियाद ढांचे विकसित किए जा रहे हैं।

पर्यटन को 1998 में उद्योग का दर्जा प्रदान किया गया है।

प्रदेश में 2000-01 में पर्यटन पुलिस का गठन कर आगरा, वाराणसी के लखनऊ में तैनात किया गया है। झांसी, इलाहाबाद व मथुरा में भी पर्यटन पुलिस की तैनाती की गई है। केंद्र द्वारा कुशीनगर व श्रावस्ती में टीएफएसओ की तैनाती की गई है।

पर्यटन क्षेत्र में अधिक पूंजी निवेश के लिए एकल मेज प्रणाली भी लागू की गई है।

भारतीय मूल के विदेशियों के भारतीय पूर्वजों की खोज राज्य पर्यटन विभाग द्वारा चलाई जा रही डिस्कवर योर रूट्स योजना के तहत की जाती है।

राज्य के महानगरों व पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों को 'होम स्टे' के रूप में आरामदायक व सस्ती, आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से केंद्र द्वारा मई 2008 से शुरू की गई इनक्रेडिबल इंडिया बेड एंड ब्रेकफास्ट योजना को राज्य पर्यटन विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है।

किसी निजी मकान मालिक द्वारा अपने मकान का अधिकतम 5 कमरा पर्यटकों को किराये पर दिये जाने संबंधी पेइंग गेस्ट योजना प्रदेश में 1994 से चल रही है।

जापान की सहायता से बौद्ध परिपथ योजना के प्रथम चरण में बौद्ध परिचय के अंतर्गत आने वाले जिलो (सारनाथ, देवरिया, मऊ, कुशीनगर, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, कौशाम्बी आदि) के पर्यटन स्थलों के विकास हेतु कुछ कार्य हुए थे। इस परिपथ के पर्यटन स्थलों, सड़कों आदि के समेकित विकास हेतु बौद्ध परिपथ योजना के दूसरे चरण का कार्य किया जा रहा है।

बौद्ध परिपथ के तहत दिसम्बर 2013 में मैत्रेय परियोजना का शुभारंभ हुआ। इस परियोजना के तहत कुशीनगर में बुद्ध की भव्य (500 फीट) ऊंची प्रतिमा बनाई जाएगी। इसमें प्राथमिक और उच्चतर शिक्षा के लिए एक विशाल और आधुनिक संस्थान, एक निशुल्क चिकित्सा सुविधा इकाई, ध्यान चिंतन मंडप, फव्वारे, जलाशय, पार्क और एक अतिथि गृह का निर्माण शामिल है।

कुशीनगर में पीपीपी के आधार पर एक हवाई अड्डे का भी निर्माण किया जाता है।

विश्व बैंक द्वारा प्रदेश में चल रही प्रो-पूअर टूरिज्म योजना हेतु वित्त का पोषण किया जा रहा है।

राज्य के तीन स्मारक यूनेस्को के मूर्त विश्व धरोहर सूची में हैं- ताजमहल (1983), आगरा किला (1983) व फतेहपुर सिकरी (1986)।

विन्ध्याचल के अष्टभुजी व काली खोह तथा चित्रकूट के लक्ष्मण पहाड़ी पर निजी क्षेत्र के सहयोग से दर्शनार्थियों की सुविधा हेतु रोप-वे शीघ्र ही चालू होने वाला है, जबकि बरसाना में रोपवे प्रस्तावित है।

विदेशी पर्यटकों के लिए प्रदेश का (भारत का भी) प्रथम महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल ताजमहल व द्वितीय आगरा फोर्ट है।


उत्तर प्रदेश में धार्मिक ऐतिहासिक व पर्यटन स्थल


अयोध्या - फैजाबाद जिले में सरयू नदी के दाये तट पर स्थित इस नगर का प्राचीन नाम अयाज्सा था। यह जैन तीर्थंकरों आदिनाथ या ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनंदनाथ, सुमतिनाथ व अनंतनाथ का भी जन्मस्थल है

महाजनपद काल में यह (साकेत) कोशल जनपद की प्रमुख नगरी थी जो उत्तरी भाग की राजधानी थी।

इस नगरी में सीता-राम-हनुमान के अनेक मंदिर है। कनक भवन, रामजन्मभूमि, हनुमानगढ़ी, पणिपर्वत, सीताकुंड, सरयू नदी तट पर राम की पौढ़ी, रामकथा संग्रहालय आदि यहां के प्रमुख स्थल हैं।


कपिलवस्तु (पिरहवा) - कपिलवस्तु की पहचान उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के पिपरहवा से की गई है।

बौद्ध काल में कपिलवस्तु शाक्य गणराज्य की राजधानी थी और गौतमबुद्ध के पिता शुद्धोधन यहां के शासक थे।

यहाँ से एक बौद्ध स्तूप तथा उसके भीतर रखी हुई बुद्ध की अस्थियां युक्त एक पाषाण पंजूषा प्राप्त हुई है। वर्तमान में स्तूप के अवशेष एवं मंजुषा लखनऊ संग्रहालय में सुरक्षित है। यहां उत्तरी काली ओपदार मृद्भाण्ड युग के अवशेष प्राप्त हुए है।

मौर्य सम्राट अशोक ने इस पवित्र स्थल की यात्रा की थी। यहां के सालारगढ़ पुरातात्विक स्थल से कुषाणों के सिक्के मिले हैं।


लुम्बिनी - गौतम बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था, जो कि महाराजगंज जिले के नौतनवां स्टेशन से 15 किलोमीटर दूरी पर नेपाल में अशोक अपने अभिषेक के 20वें वर्ष इस स्थल की यात्रा किया था और यहां के लोगों पर कर घटाकर 1/8 भाग कर दिया था। उसने यहां पर लेखयुक्त एक शिला स्तम्भ गड़वाया। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस स्थल की यात्रा की थी

अश्वघोष के बुद्धचरित में भी इस स्थल का उल्लेख बुद्ध के जन्मस्थल के रूप में किया गया है।


काशी (वाराणसी) - यह प्रदेश या देश के ही नहीं बल्कि संसार के प्राचीनतम नगरों में से एक है। इसे वरूणा व अस्सी नामक दो नदियों के मध्य स्थित होने के कारण वाराणसी भी कहा जाता है। इसका प्रथम उल्लेख अर्थववेद में प्राप्त होता है।

महारभारत तथा रामायण में भी काशी राज्य का उल्लेख है। 6वीं शताब्दी ई.पू. के षोडष महाजनपदों में काशी प्रमुख महाजनपद था।

महाभारत के अनुसार काशी की स्थापना दिवोदास नामक राजा ने की थी। यह शैव धर्म का प्रमुखकेंद्र तथा हिंदू धर्म की एक महत्वपूर्ण धार्मिक नगरी के रूप में सदैव प्रतिष्ठित रहा है।

जैन धर्म के 6वें और 23वें तीर्थंकर (सुपार्श्वनाथ व पार्श्वनाथ) का जन्म यहीं हुआ था। अतः यह जैनियों का भी तीर्थ है।

यहां के प्रमुख दर्शनीय मंदिर व स्थल हैं- विश्वनाथ (अहिल्याबाई होल्कर निर्मित), अन्नापूर्णा, संकटमोचन, दुर्गा मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विश्वनाथ मंदिर, आदि विश्वेश्वर, साक्षी विनायक और पांचरल आदि।

कुंडों तथा वापियों में दुर्गा कुंड, पुष्कर कुंड, पिशाचमोचन, कपिलधारा, लोलार्क, मानसरोवर तथा मंदाकिनी उल्लेखनीय है। यहां गंगा पर कुल 84 घाट हैं, जिनमें से अस्सी, तुलसी, हरिश्चंद्र, अहिल्याबाई, दशाश्वमेध तथा मणिकर्णिका आदि विशेष प्रसिद्ध हैं।


कालिंजर- प्रदेश के बांदा जनपद में स्थित कालिंजर एक वर्गीकृत स्थल है। 1022 ई. में महमूद गजनवी ने कालिंजर को पदाक्रांत किया था।

1202 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चंदेल शासक परमर्दिदेव को कालिंजर में पराजित किया था।

1545 ई. में कालिंजर के सैन्य अभियान में बारूद विस्पफोट से शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई थी।


देवगढ़ - ललितपुर जिले के बेतवा के किनारे देवगढ़ (देवताओं का किला) हिंदुओं और जैनियों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। इस स्थान से गुप्तकालीन हिंदू मंदिर एवं मूर्तियों के साक्ष्य मिले हैं। इनमें विष्णु का दशावतार मंदिर सर्वाधिक उल्लेखनीय है।

यहां 31 जैन मंदिरों का समूह है, जिनमें से 11वां व 12वां मंदिर विशेष है। इन जैन मंदिरों के अलावा यहां गजेंद्र मोक्ष, वराह मंदिर, सिद्ध की गुफा, राजघाटी व नाहरघाटी भी दर्शनीय है।

यहां से जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी द्वारा उत्क्रीर्णित लिपियों के साक्ष्य तथा चंदेलों के अभिलेख भी प्राप्त हुए हैं।


जौनपुर - जौनपुर की स्थापना सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने 1358 ई. में मुहम्मद तुगलक उर्फ जौना खां के सम्मान में की थी।

जौनपुर अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों एवं स्थापत्य कला के लिए चर्चित रहा। साहित्य, स्थापत्य (जैसे- अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा व जामा मस्जिद आदि) व संगीत कला के लिए जौनपुर के शर्की सुल्तानों का योगदान चिरस्मणीय रहा है। इसी विशेषता के कारण जौनपुर को 'शीराज-ए-हिंद' कहा जाता है।


कड़ा - यह स्थान इलाहाबाद से 61 किमी पश्चिम गंगा तट पर कौशांबी जिले में स्थित है। गंगा-यमुना दोआब तथा प्रमुख व्यापारिक मार्ग पर अवस्थित होने के कारण इसका आर्थिक महत्व था, जिस कारण सल्तनत एवं मुगल काल में यह एक महत्वपूर्ण इक्ता (सूबा) था।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के समय कड़ा का सूबेदार अलाउद्दीन खिलजी था। कड़ा से ही अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 ई. में अपना देवगिरि अभियान सम्पन्न किया था।

1296 ई. में कड़ा में ही सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की हत्या अलाउद्दीन खिलजी ने करवाई थी और अपने को दिल्ली सल्तनत का सुलतान घोषित कर लिया था। शाहजादा सलीम ने 1602 ई. में अकबर के विरु ( विद्रोह करके कड़ा दुर्ग में ही शरण ली थी।

1765 ई. में सन्धि के अनुसार अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अंगेज कंपनी को कड़ा क्षेत्र सौपं दिया था। भक्त संत मलूकदास की जन्मस्थली कड़ा था।


काल्पी - यह स्थल जालौन जिले में यमुना नदी के तट पर स्थित है। दसवीं शताब्दी ई. में काल्पी में चंदेलों का शासन स्थापित था। बारहवीं शताब्दी के अंत में कुतुबुद्दीन ऐबक ने काल्पी को दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया था।

फिरोजशाह तुगलक के पश्चात यह एक स्वतंत्र मुस्लिम राज्य बन गया था। अकबर के समय मुगल साम्राज्य का एक प्रमुख नगर था। बीरबल का जन्म यहीं हुआ था। यहां से बीरबल के रंगमहल तथा मुगल टकसाल के अविशेष प्राप्त होते हैं।


अतरंजीखेड़ा - यह प्रदेश के एटा जिले में काली नदी तट पर स्थित है।

यहां से प्राप्त अवशेष मुख्यतः चित्रित धूसर मृभाण्ड संस्कृति से सम्बद्ध हैं। यहां से अग्निकुंड व धान की खेती के भी प्रमाण मिले हैं।


अहिच्छत्र - अहिच्छत्र की पहचान राज्य के बरेली जिले में स्थित रामनगर से की गई है। महाजनपद काल में यह भूभाग उत्तरी पांचाल की राजधानी थी। अशोक ने यहां पर एक स्तूप बनवाया था।


कौशाम्बी - यह नगर इलाहाबाद के दक्षिण-पश्चिम 60 किमी. की दूरी पर यमुना नदी के तट पर स्थित था। इसे आध-नगरीय स्थल भी कहा जा सकता है। महाजनपद युग में यह वत्स जनाद की राजधानी थी जहां का राजा उदयन था। यहां से कुषाण शासकों यथा-विम कडपिफसेस व कनिष्क के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। यहां पर घोषिताराम-विहार (निर्माणक घोषित नामक श्रेष्ठ) था।

अशोक व समुद्र गुप्त का प्रयाग स्तम्भ अभिलेख जिसे अकबर ने इलाहाबाद के किले में स्थापित करवाया था, भी यहीं था। यह बौद्ध थेरपंथ का केंद्र था। राजा उदयन किला अवशेष, घोषितराम-विहार अवशेष, दिगम्बर जैन मंदिर आदि यहां के दर्शनीय स्थल हैं।

प्रसिद्ध जैन तीर्थ प्रभाषगिरि (प्रभोसा) यहां से 10 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहीं पर महावीर स्वामी को माता शक्ति ने दीक्षा दिया था।


आलमगीरपुर - आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश में मेरठ के समीप हिंडन नदी के किनारे स्थित है। आलमगीरपुर के उत्खनन से प्राप्त अवशेष सैन्धव सभ्यता के पूर्वी विस्तार की पुष्टि करते हैं।

यह स्थल उत्तर-हड़प्पा सभ्यता का भी केंद्र था। आलमगीरपुर के कपास उत्पादन के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।


कोइल - कोइल अथवा कोल अलीगढ़ जिले में स्थित है। भारत में तुर्कों के आगमन के समय इस पर राजपूतों का प्रभुत्व स्थापित था।

कुतुबद्दीन ऐबक ने 1192 ई. में कोइल पर अधिकार स्थापित किया था। इब्नबतूता कोइल के नगर वैभव की प्रशंसा करता है।

सुल्तान बहलोल लोदी के समय कोइल का स्थानीय शासक ईसा खां था। जिसने बहलोल की अधीनता स्वीकार कर ली थी।


झांसी- झासी एक मध्यकालीन नगर है जिसकी स्थापना 1681 ई. में ओरछा शासक वीर सिंह बुंदेला ने की थी। रानी लक्ष्मीबाई झाँसी के स्वतंत्र राज्य के शासक गंगाधर राव की पत्नी है।

1857 ई. में महान विद्रोह में अपनी वीरता व साहस का लोहा अंग्रेजों से स्वीकार करके भारत के स्वतंत्रता संग्राम में वीर गति प्राप्त की थी।

झांसी में लक्ष्मीबाई का महल, महादेव मंदिर व मेंहदी बाग आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक है।


प्रयागराज - प्रयागराज (इलाहाबाद) गंगा-यमुना के मध्य व संगम पर स्थित है।

अकबर ने कौशाम्बी स्थित अशोक स्तम्भ को प्रयाग में अपने किले में स्थापित करवाया था, जिस पर हरिषेण रचित गुप्तवंशीय समुद्रगुप्त का भी लेख उत्कीर्ण है। अकबर ने प्रयाग की पुनस्थापना कर 'इलाहाबाद' नाम दिया जो आज सर्वाधिक प्रचलित है।

प्रयाग का धार्मिक महत्व त्रिवेणी संगम के कारण सदैव से रहा है। हर्षवर्धन प्रति पांचवें वर्ष प्रयाग में महामोक्ष परिषद् का आयोजन करता था।

यहां हर बारहवें वर्ष महाकुंभ व महाकुंभ के 6वें वर्ष कुंभ तथा महाकुंभ व कुंभ से इतर वर्षों में माघ मेला लगता है।

संगम पर एक किला है, जिसे अकबर ने बनवाया था। किले के अंदर पौराणिक अक्षयवट है।


भीतरगांव - कनपुर देहात जिले में स्थित भीतरगांव गुप्तकालीन शैली अर्थात् ईंट और पत्थरों से निर्मित मंदिर के भग्नावशेष के कारण प्रसिद्ध है। यह मंदिर चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के काल में बना था।


फतेहपुर सीकरी- फतेहपुर सीकरी आगरा से 10 किमी की दूरी पर स्थित है।

1878 ई से 11588 ई. तक यह मुगल साम्राज्य की राजधानी रही।

फतेहपुर सीकरी के शानदार स्थापत्य प्रतीकों में शेख सलीम चिश्ती का मकबरा, बुलंद दरवाजा, जामा मस्जिद,जोधाबाई का महल, दीवाने खास, बीरबल का महल, मरियम का महल, पंच महल आदि प्रसिद्ध है।


सारनाथ-  बौद्ध सम्प्रदाय एवं मौर्यकाल से सम्बद्ध यह प्राचीन स्थल वाराणसी से 12 किमी. उत्तर में स्थित है। बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध का पहला उपदेश अर्थात् धर्मचक्र प्रवर्तन सारनाथ में हुआ था। मौर्य सम्राट अशोक ने सारनाथ में एक सिंह-शीर्ष प्रस्तर स्तम्भ बनवाया था।

स्वतंत्र भारत के राज चिन्ह के रूप में इसी सिंह-शीर्ष को अपनाया गया है। यह मौर्य प्रस्तर कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

मध्य युग में गहड़वाल-शासक की रानी कुमारदेवी ने यहां विहार और संघाराम बनवाए थे। 11वें जैन तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का जन्म सिंहपुरी (वर्तमान सारनाथ) में हुआ था।

धमेक स्तूप (गुप्तकालीन), चौखंडी स्तूप (संभवतः अशोक निर्मित), मूलगंध कुटी विहार, धर्मपराजिका स्तूप, सद्धर्म चक्र विहार(अवशेष), मृगदाव पक्ष विहार, जापानी-कोरियाई थाई चर्मी चीनी बौद्ध मंदिर जैन मंदिर व सारनाथ मंदिर आदि यहां के दर्शनीय स्थल है। श्रावस्ती श्रावस्ती जिले में स्थित वर्तमान सहेट-महेट नामक स्थान की पहचान प्राचीन श्रावस्ती के रूप में की जाती है। यहां महाजनपद से लेकर गुप्तोत्तर युग तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं। महाजनपद युग में यह कोशल महाजनपद की दूसरी राजधानी थी।


श्रावस्ती- तीन प्रमुख व्यापारिक मार्गो (उत्तरापथ, दक्षिणापथ व मध्यपथ) के केंद्र में स्थित होने के कारण आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक महत्व रखता है। यह भगवान बुद्ध की प्रिय नगरी थी। यहां बुद्ध ने 25 वर्षाकाल व्यतीत किया था। यहां के साहूकार अनाथपिंडक ने जेतवन-विहार बनवाकर भगवान बुद्ध को दान में दिया था। आजीवक सम्प्रदाय के महान प्रवर्तक मक्खलि गोसाल की जन्मस्थली यहीं थी।


बदायूं - बदायूं सल्तनत काल में सर्वाधिक महत्वपूर्ण इक्ता था। सुल्तान बनने से पूर्व इल्तुतमिश बदायूं का ही इक्तादार था। सूफी संत शेख निजामुद्दीन औलिया बदायूं के ही अकबर के समय का प्रमुख इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी भी बदायूं का था। दिल्ली लखनौती मार्ग का यह प्रमुख केंद्र स्थल था। अतः इसका व्यापारिक आर्थिक महत्व था।


मॉडी - मुजफ्फरपुर नगर जिले में स्थित इस स्थल में सैन्धव कालीन साक्ष्य मिले हैं। इस स्थल पर एक खेत से भारी मात्रा में सोने के छल्ले, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा इंटें प्राप्त हुई हैं। यहां से प्राप्त मृदभांड हड़प्पा सभ्यता से

प्राप्त मृद्भाण्डों के समतुल्य है।


कुशीनगर - कुशीनगर (कुशीनारा) गोरखपुर से लगभग 45 किलोमीटर दूर वर्तमान कसया नगर के पास स्थित है। महाजनपद काल में यह मल्ल गणराज्य की राजधानी थी। भगवान बुद्ध का महानिर्वाण (483 ई.पू.) यहीं हुआ था।

अशोक ने यहां कई स्तूपों व विहारों का निर्माण कराया था। कुमारगुप्त के समय हरिबल ने भी यहां पर स्तूप व विहार बनवाये थे। यहां का सबसे अधिक उल्लेखनीय मंदिर महापरिनिर्वाण मंदिर है। जिसमें 5वीं शताब्दी की 6.10 मी लंबी शयन मुद्रा में बुद्ध की विशाल प्रतिमा है। इस स्थान के समीप ही बुद्ध की साढ़े दस फुट ऊंची एक और प्रतिमा सुरक्षित है, जो मध्यकाल की है। इसे माथाकुंअर कहते हैं। यह मूर्ति गया के काले पत्थर से बनी है। उपराक्त के अलावा यहां 15 मी. ऊंची रामाभर स्तूप (मुकुट बंधन चैत्य), वाट-थाई मंदिर, राजकीय बौद्ध संग्रहालय, लंकाई-चीनी, जापानी-बर्मी-कोरियाई मंरि, बिड़ला बुद्ध  मदिर, शिव मंदिर, राम-जानकी मंदिर आदि दर्शनीय है।

बुद्ध पूर्णिमा से यहां मेला लगता है जो लगभग डेढ़ माह तक चलता है। जापान की मदद से यां तक महत्वकांक्षी 'तैत्रेय परियोजना' चलाई जा रही है। इस परियोजना के तहत कुशीनगर का विकास एक अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध धर्मस्थल के रूप में किया जा रहा है। इसी परियोजना के तहत यहां बुद्र की 500 फुट लंबी प्रतिमा स्थापित की जाती है, जो विश्व की सबसे ऊंची होगी।


लखनऊ- माना जाता है कि इस नगर को भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण ने बसाया था और इसका प्राचीन नाम लक्ष्मणपुरी था। लखनऊ को सबसे अधिक प्रसिद्ध उत्तर मुगलकाल में तब मिली, जब अवध के सुबेदार सआदत खां ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। नवाब आसफउदौला के समय अवध की राजधानी फैजाबाद से लखनऊ लाया था और तब से वाजिद अली शाह (1856 ई.) तक यह सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा।

1857 के विद्रोह में वीरांगना बेगम हजरतमहल ने अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया था। मोहम्मद अली शहा ने हुसैनाबाद का इमामबाड़ा, बड़ी जामा मस्जिद, हुसैनाबाद बारामदी आदि इमारतें बनवाई। प्रसिद्ध छतर मंजिल का निर्माण नसीरुद्दीन हैदर ने करवाया।

यहां पर सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट स्थित है। स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों के सम्मान में यहां बनवाया गया शहीद स्मारक, चिड़ियाघर और नेशनल बोटेनिकल गार्डेन भी दर्शनीय है। यहां प्रसिद्ध मुस्लिम संत शाहमीना की मजार है। हिंदू और मुसलमान, दोनों ही उनके भक्त हैं।


बाराबंकी - बाराबंकी में लोधेश्वर महादेव, कुंतेश्वर महादेव कोटवाधाम आदि प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं। कहा जाता है कि यहां के महादेव की स्थापना स्वयं महाराज युधिष्ठिर ने की थी। किन्तूर ग्राम में महारानी कुन्ती द्वारा स्थापित कुन्तेश्वर मंदिर है। इसी जनपद के ग्राम बदोसराय में हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रतीक सलामत शाह का मजार है।


कन्नौज - प्राचीन काल में कान्यकुंज के नाम से प्रसिद्ध कन्नौज का उल्लेख टॉलेमी के 'द ज्योग्राफी' संजलि के महाकाव्य, कई पुराणों, महाभारत एवं चीनी यात्रियों (फाहियान, हेनसांग) के यात्रा विवरणों में प्राप्त होता है।

कन्नौज में सबसे प्राचीन बस्ती के साक्ष्य वाले मृद्भाण्ड युग से प्राप्त हुए हैं। हर्षवर्धन के समय कन्नौज के वैभव की भूरि-भूरि प्रशंसा  की है। इस समय कन्नौज 'नगरमहोदय श्री' कहलाता है।

विकाल में कन्नौज में अनेक संघालय थे, जिसमे लगभग दस हजार भिक्षु रहते थे। हर्षोत्तर युग में हुए त्रिदलीय संघर्ष का कारण इस नगर का वैभव व आर्थिक राजनैतिक महत्ता ही थी।

मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय कन्नौज का शासक जयचंद गहड़वाल था। यहां के बौद्ध महाविद्यालनय में चीनी यात्री हवेनसांग ने अध्ययन-अध्यापन किया था।

राजशेखर, भवभूति, वाण आदि विद्वान कन्नौज से सम्बद्ध रहे थे। यह नगर छठी शताब्दी ई.पू. से बारहवीं शताब्दी तक भारत की राजधानी रहा और उत्सवों की रंगस्थली था।

पुरातत्व, कला और संस्कति का केंद्र कन्नैज अपने इत्र की मुवासित गंध के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां हजारों वर्ष पुराने खंडहर, मंदिर और मस्जिद पर्यटकों के लिए आकर्षक के केंद्र हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं- क्षेमकली देवी का मंदिर, पट्मावती सती का मंरि, जयचंद्र का किला आदि।


पावानगर - यह स्थान कुशीनगर जिले में स्थित है। जैन तीर्थकर महावीर स्वामी ने 468 ई.पू. में इसी स्थान पर अपने शरीर का त्याग किया था। प्रत्येक कार्तिक पूर्णिमा को यहां निर्वाण महोत्सव मनाया जाता है।


सारों या शूकर क्षेत्र - कासगंज जिले में स्थित सोरी क्षेत्र देश के प्रमुख तीर्थों में से एक है। पुराणों के अनुसार विश्व निर्माण की प्रक्रिया इसके निर्माण से प्रारंभ हुई थी। यहां एक प्राचीन मंदिर है, जिसमें श्री वाराह भगवान की एक विशाल प्रतिमा है।

मंदिर के पास ही बाराह घाट है, जिसे हरिवंदी भी कहते है। यह वास्तव में एक बड़ी झील है जिसके चारों ओर मंदिर और घाट बने हुए हैं।

मंदिरों तथा दर्शनीय स्थलों में प्रमुख है श्री योगेश्वर श्री सीताराम और श्री बटुकेश्वर नाथ के मंदिर तथा इलाहाबाद जैसा अक्षयवट आदि। पृथ्वी पर गंगा को लाने के लिए राजा भागीरथ ने यहां तपस्या की थी।


मगहर - संत कबीर नगर जिले में स्थित मगहर संत कबीर का महाप्रयाण स्थल है जो हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। वह कबीर पन्थियों का तीर्थ स्थल है। ध्यातव्य है कि यहां पर कबीर दास के समाधि स्थल के कबीर ही उन के पुत्र कमाल का भी समाधि स्थल है।


हस्तिनापुर (मेरठ) - यह नगरी मेरठ से 37 किलोमीटर दूर है। इसके पुरातात्विक स्थलों से मृदभांड संस्कृतियो से लेकर मौर्योत्तर युग का के साथ मिले है। इसकी स्थापना इस्तिन नामक राजा ने की थी। महाभारत युग में यह कौरवों की राजधानी थी।

मौर्योत्तर युग में (शुंग काल के) अवशेष, प्रस्तर प्रतिमाएं, मथुरा के दत्तवंशी शासकों, कुषाणे तथा यौधेयों की मुद्राएं यहां से प्राप्त हुई हैं। कार्तिक पूर्णिमा को यहां बड़ा ही लगता है।

यह एक प्रसिद्ध जैन तीर्थ भी है। 16वें, 17वे व 18वें तीर्थंकरों (क्रमशः शांतिनाथ, कुन्थुनाथ व अरनाथ) का जन्म व दीक्षा यहीं हुआ था। आदि तीर्थकर ऋषभदेव जी को राजा श्रेयांस ने यहीं इक्षपुरस का दान दिया था।

इसलिए इसे 'दानतीर्थ' भी कहा जाता है।


देवीपाटन (बलरामपुर) - यहां तुलसीपुर रेलवे स्टेशन के निकट पाटेश्वरी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। कहा जाता है कि यहां पर देवी की स्थापना महाराज विक्रमादित्य ने की थी। यहां प्रतिवर्ष मेला लगता है।


देवा शरीफ (बाराबंकी)- बाराबंकी से लगभग 12 किमी. दूर स्थित देवा में प्रसिद्ध सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार है। उनके वार्षिक उर्स के अवसर पर कार्तिक में एक बड़ा मेला लगता हैं


कम्पिल (फर्रुखाबाद) - विष्णु पुराण, जातक, रामायण तथा उत्तराध्ययन सूत्र एवं अनेक ग्रंथों में इस नगरी का उल्लेख विभिन्न रूपों, प्रसंगों तथा परिवेशों में किया गया है।

महाजनपद युग में यह द. पांचाल जनपद की राजधानी थी। गंगा के दायें तट पर स्थित यह तीर्थ स्थान जैन धर्म के प्रवर्तक तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ महासती द्रौपदी तथा गुरू द्रोणाचार्य की जन्मस्थली है। द्रौपदी का स्वयंवर

यहीं हुआ था।

यहां के प्रसिद्ध स्थानों में - मुगल घाट (औरंगजेब), राजा द्रुपद किला, कल्पेश्वनाथ मंदिर, रामेश्वर शाम मंदिर, कपिल मुनि का आश्रम, जैन श्वेताम्बर मंदिर, जैन दिगम्बर मंदिर, मेधकुंड, द्रोपदी कुंड आदि मुख्य है।


आगरा - यमुना के आयें तट पर सिथत इस नगर की स्थापना 1504 ई. में सुल्तान सिकंदर लोदी ने की थी। उसने इसे सामरिक महत्व का स्थान घोषित कर सैनिक राजनैतिक केंद्र बनाया था। मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने इसे अपनी राजधानी बनाया, जो कि औरंगेजब के समय तक रहा।

अकबर ने यहां किला निर्मित कराकर अनेक भव्य भवनों का निर्माण कराया। नूरजहां ने आगरा में अपने पिता एत्माद्दौला का शानदार मकबरा निर्मित कराया थ। शाहजहां ने जहांगीरी एवं अकबरी महल, मोती मस्जिद तथा स्थापत्यकला के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक ताजमहल का निर्माण कराया। मुगल काल मे आगरा मुस्लिम शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।

आगरा शहर के विकास को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 'आगरा महोत्सव 2021' तैयार की गई है और इसको नगर योजना एवं विकास अधिनियम के अंतर्गत स्वीकृति प्राप्त है। इसके अंतर्गत आरगा के पुरात्विक एवं ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए विश्रिान्न नगरीय क्रियाओं के लिए 20016.97 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया जा रहा है।

आगरा शहर से 80 किमी. की दूरी पर स्थित शौरीपुर में 22वें जैन तीर्थंकर श्री नेमिनाथ का जन्म हुआ था।


चित्रकूट - प्रदेश के दक्षिणी भाग में स्थित चित्रकूट वर्तमान में एक जिला और मंड भी है। वन जाते समय श्रीरामजी अधिकांश यही ठहरे थे। जनश्रुति के अनुसार यहां महर्षि बाल्मीकि भी रह रहे थे।

मंदाकिनी नदी जिसे मयस्विनी भी कहते हैं, चित्रकूट के सुरम्य जंगलों से होकर कहती है। इस नदी के बायें तट पर कामतानाथ से लगभग 2.4 किमी. दूरी पर स्थित सीतापुर में राघवप्रयाग, कैलाश घाट, रामघाट और घृतकल्प घाट आदि) 24 घाट तथा अनेक प्राचीन मंदिर है।

सीतापुर से लगभग 3.0 किमी. की दूरी पर सती अनुसूईया और महर्षि अत्रि का आश्रम तथा यहां स्थित मन्दराचल पर्वत के अंचल में अनसूइया अत्रि, दत्तत्रेय और हनमान जी के मंदिर है।

सीतापुर से 3.3 किमी पर जानकी कुंड तथा जानकी कुंड से 3.3 किमी. दूरी पर स्पफटिक शिला है जहां राम, लक्ष्मण और सीता ने विश्राम किया था। अन्य दर्शनीय स्थलों में हनुमानधारा, भरतकूप व गुप्त गोदावरी मुख्य सीतापुर के पास स्थित कामदगिरि की लोग परिक्रमा करते हैं।

कार्तिक अमावस्या (दीपावली) को यहां बहुत बड़ा मेला लगता है।


राजापुर - गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली राजापुर चित्रकूट से 38.1 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहां तुलसी स्मारक समिति की ओर से एक सुंदर स्मारक का निर्माण हुआ है।


गढ़मुक्तेश्वर - मेरठ से 12 किमी. दूर हापुड़ जिले में गंगा के दाहिने तट पर सिीत गदक्तेश्वर प्राचीन काल में हस्तिनापुर नगर का एक मोहल्ला था। यहां गढ़मुक्तेश्वर शिव का मंदिर है।

मंदिर के पास ही झारखंडेश्वर नाम का प्राचीन शिवलिंग है। कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेला लगता है।


देवबंद - सहारनपुर में स्थित देवबंद में एक प्रसिद्ध कलात्मक व धार्मिक दुर्गा का मंदिर है। मंदिर के पास ही देवी कुंड है जो श्रद्धालुओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां अरबी भाषा से सम्बद्ध एक संस्थान है जिसका नाम दारुल उलूम है।


शुक्रताल (मुजफ्फरनगर)- मुजफ्फरनगर जिले में स्थित इस स्थल पर तट वृक्ष के नीचे बैठकर महर्षि शुक्राचार्य जी ने राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनाई थी।

कार्तिक में पूर्णमासी व एकादशी पर हजारों भक्त दर्शन के लिए यहीं आते हैं। यहां प्रायः प्रत्येक मास में भागवत सप्ताह का आयोजन होता रहता है। यहां अनेक मंदिर है।


बहराइच - यहां पर एक प्रसिद्ध मुस्लिम फकीर सैयद सालार व मसूद गाजी की पवित्र दरगाह है। ये संत महमूद गजनवी के साथ भारत में आये थे। यहां के मेले में प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में मुस्लिम एवं हिन्दू भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु आते हैं।


गोरखपुर - पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह नगर राप्ती नगर के बायें तट पर बसा है। यहां से भारत का प्रमुख धार्मिक मासिक पत्र 'कल्याण' प्रकाशित होता है जो धार्मिक पुस्तकों के प्रसिद्ध प्रकाशक 'गीता प्रेस गोरखपुर' का प्रकाशन है। बाबा गोरखनाथ मंदिर यहां का मुख्य दर्शनीय स्थल है। यह महायोगी गोरखनाथ की तपस्थली व नाथ सम्प्रदाय की सिद्धपीठ भी है।


चुनार - चुनार विन्ध्य पहाड़ी क्षेत्र में गंगा नदी के तट पर मिर्जापुर जिले में स्थित है। चुनार से पूर्वी भारत पर नियंत्रण रखा जा सकता था। चौदहवीं शताब्दी में चुनार में चंदेलों का शासन स्थापित था।

मुगल सम्राट बाबर ने चुनार पर अधिकार कर लिया था। शेरशाह सूरी के दमन के क्रम में हुमायूं ने चुनर के किले की घेराबंदी की थी परंतु शेरशाह ने चुनार पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया थ। यहां के दुर्ग में विक्रमादित्य द्वारा निर्मित मतृहरि मंदिर है पास ही बल्लभ सम्प्रदाय का कूप मंदिर भी है।


चंदावर - चंदावर नामक स्थल कन्नौज एवं इटावा के मध्य स्थित था। 1994 ई. में कन्नौज के गढ़वाल नरेश जयचंद को मुहम्मद गोरी ने यहीं पर हुमायूं को पराजित किया था।


पांचाल - यह राज्य वर्तमान बरेली, बदायूं व पुरर्रुखाबाद जनपदों की भूमि पर बसा हुआ है। महाभारत काल में यहां के राजा द्रुपद थे जिनकी कन्या द्रोपदी थी। महाजनपद काल में यह एक प्रमुख गुणराज्य था जो दो भागों में बंटा था। उत्तरी पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र व दक्षिणी पांचाल की राजधानी काम्पिल्य थी।


बांसखेड़ा - शाहजहांपुर जिले में गगा नदी के तट पर स्थित बासखेड़ा से 628 ई. का एक ताम्रपत्र मिला है, जिससे हर्ष की बंशाली, प्रशासनिक संरचना आदि की जानकारी प्राप्त होती है। इस अभिलेख में हर्ष के हस्ताक्षर की अनुलिपि भी उत्कीर्ण है।


मेरठ - मेरठ में राजपूत सरदार हरदत्त ने एक किला निर्मित कराया था। बारहवीं शताब्दी के अंत में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मेरठ को दिल्ली सल्तनत का भाग बना लिया था। फिरोजशाह तुगलक ने अशोक स्तम्भ लेख को मेरठ से उठाकर दिल्ली में स्थापित कराया था। 10 मई, 1857 को भारत के महान विद्रोह का विस्फोट मेरठ से ही हुआ था।


महोबा - 831 ई. में चंदेल राजपूतों ने महोबा को अपनी राजधानी बनाई थी। चंदेलों का राज्य जेजाकभुक्ति (जुझौती) के नाम प्रसिद्ध था। चंदेलों द्वारा निर्मित स्थापत्य अवशेष इसकी ऐतिहासिकता प्रकट करते हैं।

19वीं शताब्दी के प्रारंभ में महोबा पर तुकों का आधिपत्य स्थापित हो गया था। कीरत सागर, चंदेल कालीन स्मारक व गोखर पहाड़ी पर 24 जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल है।


संकिसा- फ़र्रुखाबाद के समीप स्थित संकिसा (संकाश्य) का उल्लेख महाभारत, बौद्ध साहित्य तथा चीनी यात्रियों के विवरणों में मिलता है। महाजनपद युग में यह पांचाल जनपद का प्रमुख नगर था।

बौद्ध परम्परा के अनुसार संकिसा में भगवान बुद्ध इंद्र व ब्रह्मा के साथ स्वर्ग में अपनी मां को उपदेश देने के बाद ही यहीं पर धरती पर आए थे।


सोहगौरा - सोहगौरा गोरखपुर जिले में स्थित है। यहां से उत्तरी काली ओपदार मृदभांड संस्कृति तथा मौर्योत्तर युग से सम्बद्ध अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां से मौर्योत्तर काल के सिक्के भी मिले हैं। कुषाणों के सिक्के तथा लौह वस्तुएं भी प्राप्त हुए हैं। यहां से अनाज भण्डारण के अवशेष भी मिले हैं।


सरायनाहर राय - सराय नाहर राय प्रतापगढ़ जिले में स्थित है। यहां उत्खनन में लगभग 8000 ई.पू. की मध्यपाषाण युगीन सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं।


सम्भल - सम्भल मध्यकालीन भारत का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। बाबर की मृत्यु के बाद इस इक्ता को हुमायूं ने अपने भाई असकरी को प्रदान कर दिया था। बाबर ने यहां एक जामा मस्जिद का निर्माण कराया था।

बिठूर - बिठूर कानपुर से 24 किमी दूर गंगा के किनारे स्थित है। इसे प्राचीन काल में ब्रह्मवर्त तीर्थ कहा जाता था। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं पर स्थित था। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बचपन में यहां रही थी। कार्तिक पूर्णिमा को यहाँ पर मेला लगता है।


सरधना- यह मेरठ से 30 किमी. उ.प. में स्थित प्राचीन नगर है। जहां दक्षिण एशिया का अद्भुत चर्च है। इस चर्च को बेगम समरू ने बनवाया था। नवंबर माह के द्वितीय रविवार को यहां विशाल मेला लगता है।


शाकुम्भरी देवी - सहारनपुर में 11 किमी. की दूरी पर चारों ओर पहाड़ियों से घिरा शाकुम्भरी देवी का मंदिर एक पवित्र स्थान है। प्रत्येक वर्ष नवरात्रों में इस स्थान पर विशाल मेला लगता है।


मिश्रिख (सीतापुर) - नैमिषारण्य से 10 किलोमीटर दूरी पर मिश्रिख स्थित है। कथा है कि यहां पर महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थदान करने के पूर्व समस्त तीर्थो के जल से स्नान किया था। जिससे इसका नाम मिश्रित अथवा मिश्रिख पड़ा। यहां महर्षि दधीचि आश्रम और सीता कुंड दर्शनीय है।


हुलासखेड़ा - हुलास खेड़ा लखनऊ जनपद में स्थित है। यहां से कुषाण काल से गुप्त युग तक भौतिक अवशेष प्राप्त हुए। कुषाण कालीन अवशेषों में सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं 200 मीटर लंबी सड़क, सुनियोजित जल निकासी की व्यवस्था, कार्तिकेय की स्वर्ण प्रतिमा, चांदी के आहत सिक्के।

हुलासखेड़ा से जो गुप्तकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं, उनमें दुर्ग के भग्नावशेष, तांबे-चांदी के सिक्के, गुप्तलिपि में लिखी कुछ मुहरें, हाथी दांत की की, मोहर छापे, 17 घरों वाली लाहेक की अण्डाकार वस्तुएं प्रमुख हैं।


सिकंदरा-आगरा के समीप स्थित सिकंदरा मुगल बादशाह अकबर के मकबरे के कारण प्रसिद्ध है। अकबर ने अपने जीवनकाल में इसका निर्माण आरंभ कर दिया था। परंतु इसे 1613 ई. में जहांगीर के काल में पूर्ण किया जा सका। इस मकबरे में बौद्ध स्थापत्य शैली का प्रभाव दृष्टिगत होता है।


मथुरा - मथुरा की गणना सप्त महापुरियों में होती है। श्रीकृष्ण का जन्म यहीं हुआ था। महाजनपद युग में यह शूरसेन महारजनपद की राजधानी और कुषाण काल में उनके पूर्वी साम्राज्य की राजधानी थी। यहां से वैक्ट्रियाई यूनानी मिनेण्डर के भी सिक्के प्राप्त हुए हैं। प्राचीन काल में यह शाटक वस्त्र निर्माण का प्रमुख केंद्र था। यहां विकसित शिल्प कला को मथुरा कला के नाम से जाना जाता है। इस केंद्र को बुद्ध की प्रथम मूर्ति बनाने का श्रेय है। मथुरा लगभग 300 वर्षों तक मथुरा कला शैली का प्रमुख केंद्र रहा। 1670 इ. में औरंगजेब ने यहां के प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर की ध्वस्त करवा दिया था। औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह करके जाटों ने नेता सूरजमल ने भरतपुर राज्य की स्थापना की थी और उनकी राजधानी मथुरा में ही बनायी थी। कृष्ण जन्मभूमि मंदिर, द्वारकाधीश मंदिर और विश्राम घाट आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।


बरसाना - बरसाना गांव गोवर्धन से 24 किमी. उत्तर में कोसी (आगरा-दिल्ली सड़क पर) के 16 किमी. दक्षिण में स्थित है। इसे भगवान कृष्ण की प्रिय राधाजी का जन्मस्थान होने का गौरव प्राप्त है। बरसाना का मूल नाम ब्रह्मचारिणी था। यह स्थान लाड़ली जी (राधा जी का स्थानीय नाम) के सम्मान से निर्मित मंदिरों के सुशोभित है। यहां प्रतिवर्ष राधाष्टमी के अवसर पर मेला लगता है। यहां प्रतिवर्ष होलिकोत्सव पर लठमार होली का आयोजन किया जाता है।


वृंदावन - वृंदावन मथुरा से लगभग 9.6 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहां भगवान कृष्ण ने अपनी बाल लीलाएं की थीं। यहां बहुत से मंदिर हैं, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध गोविंद देव और रंगनाथ जी (द्रविण शैली, सपफेद पत्थर) के मंदिर हैं। गोविंद देव मंदिर का निर्माण सन 1590 में महाराज मानसिह ने कराया था। बिहारिजी का, राधा ल्लभ जी का, राधारमण जी का, श्री गोपीनाथ जी का, शाहजी का व अष्टसखी जी का मंदिर आदि यहां के अन्य प्रमुख मदिर हैं। 'निधिवन' तथा 'गिरिकुंड' धार्मिक महत्व के करील कुंज हैं तथा वंशीघाट, कालीदह और केशीघाट तथा यमुना के प्रमुख घाट हैं


गोवर्धन - यह समतल से लगभग 100 पफुट ऊंचा है, जो कि मथुरा से 23 किमी. की दूरी पर स्थित है।

गोवर्धन का परिक्रमा पथ लगभग 21-22 किमी. है। इस पथ का कुछ भाग राजस्थान है। इस पथ पर मानसी गंगा, राधा कुंड, श्याम कुंड आदि कई पवित्र सरोवर व मंदिर हैं।


दादरी - बलिया जिले में स्थित यह स्थल ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु जी के शिष्य सरदार मुनि की तपोभूमि रही है।

प्रत्येक वर्ष इस स्थान पर कार्तिक पूर्णिमा से मेला लगता है, जिसमें पशुओं का भारी मात्रा में क्रय विक्रय किया जाता है। यहां भृंगशी का एक मंदिर है।


गोला-गोकर्णनाथ- प्रदेश के लखीमपुर खीरी से लगभग 35 किमी. दूर स्थित गोला-गोकर्णनाथ में एक विशाल झील और उसके निकट भगवान गोकर्णनाथ महादेव का एक विशाल तथा प्राचीन मंदिर है। महायोगी गोरखनाथ जी द्वारा खिजड़ी प्रसाद वितरण स्थल पर स्थापित मंदिर तथा नाथ सम्प्रदाय का सिद्धपीठ यहीं पर है।


श्रृंगवेरपुर - यह स्थान इलाहाबाद नगर से लगभग 48 किमी दूर गंगा के बायें तट पर स्थित है। अपनी बनवास यात्रा के दौरान भगवान राम ने गंगा घाट के नाविक निषद के प्रार्थना करने पर उतरवाई के बदले गंगा जल द्वारा अपने पैर और प्रयाग को धुलवाया और प्रयाग को प्रस्थान किया था। रामचीराघाट, हनुमान मंदिर, श्रृंगी मंदिर आदि यहां के दर्शनीय स्थल हैं।


विंध्यांचल - मिर्जापुर जिले में स्थित इस स्थान पर विन्ध्यावासिनी देवी का पौराणिक मंदिर है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब माता सती ने अपने शरीर को अपने पिता द्वारा कराये जा रहे यज्ञ में जलाकर होम कर दिया था और भगवान शंकर सती के शरीर को लेकर जा रहे थे तो उनमें से कुछ अंग इस स्थान पर गिर गये थे। यहां पर प्रतिवर्ष दोनों नवरात्रों में मेला लगता हैं


नैमिषारण्य - सीतापुर शहर से लगभग 21 किमी. दूर स्थित इस स्थान के बारे में यह कथा प्रचलित है कि यहां के महर्षि दधीचि ने राक्षसों का नाश करने के लिए अपनी अस्थियां देवताओं को दान दी थीं। इस स्थान को 88 हजार ऋषियों की तपोभूमि और 30 हजार तीर्थों का स्थान कहा जाता है।

फाल्गुन मास में लोग यहां 84 कोस की परिक्रमा करते हैं। यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं- महर्षि दधीचि की तपस्थली, पांच पांडवों का धार्मिक सील, लोलिता देवी का मंदिर, सूत गद्दी, हनुमानगढ़ी, व्यास गद्दी व चक्र तीर्थ आदि।

पृथ्वी का सर्वापरि तीर्थ चक्रतीर्थ को कहा जाता है। प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा जी की मानसिक शक्ति में निर्मित दिव्य चक्र गिरने से यहां गोलाकार कुंड (चक्रतीर्थ) बना था।

सूत गद्दी नामक स्थान पर सूत ऋषि और शौनक आदि ऋषियों का संवाद हुआ है।

हनुमानगढ़ी नामक स्थान के बारे में कहा जाता है कि हनुमान जी अहिरावण से राम लक्ष्मण को मुक्त कराकर पाताल तोड़कर यहीं प्रकट हुए थे।


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